” जो प्राप्त है , वही पर्याप्त है “

बहुत समय पहले की बात है। हिमालय की तलहटी में महात्मा सदानंद नाम के एक संत रहते थे। वे अत्यंत विद्वान, सरल और संतोषी थे। उनका कोई स्थायी आश्रम नहीं था। वे गाँव-गाँव और नगर-नगर पैदल घूमकर लोगों को धर्म, सदाचार और संतोष का संदेश दिया करते थे। जहाँ रात हो जाती, वहीं किसी पेड़ के नीचे विश्राम कर लेते। उनके लिए धन-दौलत का कोई महत्व नहीं था।

एक दिन वे एक सुनसान जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। चलते-चलते उनकी नज़र रास्ते में चमकती हुई एक सोने की अशर्फ़ी पर पड़ी। उन्होंने उसे उठाकर अपनी झोली में रख लिया और मन ही मन बोले,
“यह अशर्फ़ी मेरी नहीं है। इसे मैं उसी व्यक्ति को दूँगा जो वास्तव में सबसे गरीब होगा।”

उस दिन के बाद महात्मा सदानंद कई राज्यों और गाँवों में घूमे। उन्होंने गरीब किसानों को देखा, मेहनत करने वाले मजदूरों को देखा, साधारण व्यापारियों को देखा। कई लोगों के पास धन कम था, लेकिन उनके चेहरे पर संतोष और मुस्कान थी। महात्मा ने सोचा, “जिसके मन में संतोष है, वह गरीब कैसे हो सकता है?” इसलिए उन्होंने किसी को भी वह अशर्फ़ी नहीं दी।

कई महीने बीत गए। एक दिन वे विजयगढ़ राज्य पहुँचे। वहाँ बड़ी हलचल थी। राजा वीरेंद्रदेव विशाल सेना के साथ पड़ोसी राज्य पर आक्रमण करने की तैयारी कर रहा था। सैनिकों के हाथों में हथियार थे, रणभेरी बज रही थी और पूरा नगर युद्ध की तैयारियों में व्यस्त था।

महात्मा धीरे-धीरे राजा के पास पहुँचे। उन्होंने अपनी झोली से वही सोने की अशर्फ़ी निकाली और राजा की ओर उछाल दी।

राजा आश्चर्यचकित रह गया। उसने क्रोधित होकर पूछा,
“महात्मन! आपने मेरे ऊपर अशर्फ़ी क्यों फेंकी? क्या आप मेरा अपमान करना चाहते हैं?”

महात्मा मुस्कराए और शांत स्वर में बोले,
“राजन! यह अशर्फ़ी मुझे कई महीने पहले मिली थी। मैंने निश्चय किया था कि इसे संसार के सबसे गरीब व्यक्ति को दूँगा। बहुत खोजने के बाद आज मुझे वह व्यक्ति मिल गया।”

राजा ने गर्व से कहा,
“मैं तो इस राज्य का सम्राट हूँ। मेरे खजाने सोने-चाँदी से भरे हैं। फिर मैं गरीब कैसे?”

महात्मा ने उत्तर दिया,
“जिसके पास अपार धन, महल और वैभव हो, फिर भी वह दूसरे के राज्य और धन पर अधिकार करने निकल पड़े, उससे बड़ा निर्धन कौन हो सकता है? सच्चा धन संतोष है। जिसके मन में संतोष नहीं, वह चाहे संसार का सबसे बड़ा राजा क्यों न हो, भीतर से गरीब ही रहता है।”

महात्मा की बात राजा के हृदय में उतर गई। उसने कुछ क्षण मौन रहकर विचार किया। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने तुरंत युद्ध रोक दिया और सेना को वापस लौटने का आदेश दे दिया।

उस दिन राजा ने प्रण लिया कि अब वह अपने राज्य की समृद्धि के लिए परिश्रम करेगा, किसी दूसरे के धन पर कभी लालच नहीं करेगा। उसके इस निर्णय से हजारों सैनिकों का जीवन बच गया और दोनों राज्यों के बीच शांति स्थापित हो गई।

महात्मा सदानंद मुस्कराते हुए अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए। उनके पास अब कोई सोने की अशर्फ़ी नहीं थी, लेकिन उनके शब्दों ने एक राजा को सच्चा धनवान बना दिया था।

 

दूसरों के धन पर लालच करने वाला व्यक्ति कभी सुखी नहीं हो सकता। सच्ची संपत्ति धन नहीं, बल्कि संतोष है। जो अपने परिश्रम से अर्जित साधनों में प्रसन्न रहता है, वही जीवन का सबसे धनी और सबसे सुखी इंसान होता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

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