एक गाँव में रामदास नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह माता लक्ष्मी का बहुत बड़ा भक्त था। हर शुक्रवार को वह व्रत रखता, पूजा करता और अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी न किसी जरूरतमंद की सहायता अवश्य करता था।
रामदास बहुत गरीब था, लेकिन उसके मन में कभी लालच नहीं था। वह हमेशा कहता, “माता लक्ष्मी धन से पहले सद्बुद्धि और संतोष देती हैं।”
एक दिन शुक्रवार की सुबह वह खेत की ओर जा रहा था। रास्ते में उसे एक वृद्ध महिला दिखाई दी। वह भूखी और थकी हुई थी। उसने रामदास से कहा, “बेटा, मुझे बहुत भूख लगी है, कुछ खाने को मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”
रामदास के पास उस समय केवल दो रोटियाँ थीं, जो उसकी पत्नी ने उसके लिए बनाई थीं। उसने बिना सोचे-समझे दोनों रोटियाँ उस वृद्धा को दे दीं और स्वयं पानी पीकर काम पर लग गया।
वृद्धा ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, तुम्हारी यह दया व्यर्थ नहीं जाएगी।”
कुछ दिनों बाद रामदास के खेत में ऐसी भरपूर फसल हुई जैसी पूरे गाँव में किसी की नहीं हुई थी। उसके घर में सुख-समृद्धि आने लगी। लोग उससे उसका रहस्य पूछने लगे।
रामदास ने कहा, “यह सब माता लक्ष्मी की कृपा और जरूरतमंदों की सेवा का फल है।”
उसी गाँव में एक धनवान व्यक्ति भी रहता था। उसने सोचा कि केवल शुक्रवार का व्रत रखने से ही धन मिलता है। उसने व्रत तो रखा, लेकिन गरीबों का अपमान करता रहा और किसी की सहायता नहीं की।
समय बीतने पर उसका व्यापार घाटे में जाने लगा। तब उसे समझ आया कि केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि दया, सेवा और अच्छे कर्म भी आवश्यक हैं।
उस दिन से उसने अपना व्यवहार बदल लिया। गरीबों की मदद करने लगा और सभी से प्रेमपूर्वक रहने लगा। धीरे-धीरे उसके जीवन में भी खुशियाँ लौट आईं।
सच्ची भक्ति केवल पूजा और व्रत में नहीं होती, बल्कि दया, सेवा, विनम्रता और अच्छे कर्मों में होती है। माता लक्ष्मी वहीं निवास करती हैं जहाँ प्रेम, संतोष और परोपकार का भाव होता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
