सीतापुर के एक छोटे से गाँव में विवेक नाम का एक युवक रहता था। वह पढ़ा-लिखा और मेहनती था, लेकिन उसकी एक आदत उसे हमेशा परेशान रखती थी—वह हर समय भविष्य की चिंता करता रहता था।
जब वह अपने खेत में काम करता, तो सोचता, “अगर इस साल बारिश कम हुई तो क्या होगा?”
जब फसल अच्छी होती, तो चिंतित हो जाता, “अगले साल कहीं नुकसान न हो जाए।”
जब घर में खुशी का माहौल होता, तो वह सोचने लगता, “पता नहीं यह खुशी कब तक रहेगी।”
धीरे-धीरे उसकी चिंता इतनी बढ़ गई कि वह वर्तमान के सुंदर क्षणों का आनंद लेना ही भूल गया। उसके माता-पिता समझाते, “बेटा, जो आज है उसे जी लो, कल की चिंता भगवान पर छोड़ दो।” लेकिन विवेक किसी की बात नहीं सुनता।
एक दिन गाँव में एक वृद्ध संत आए। लोग उनके पास अपनी समस्याएँ लेकर जाते और समाधान पाते। विवेक भी उनके पास पहुँचा और बोला, “महाराज, मैं अपने भविष्य को लेकर बहुत चिंतित रहता हूँ। मुझे डर लगता है कि कहीं मेरे साथ कुछ बुरा न हो जाए।”
संत मुस्कुराए और बोले, “कल सुबह सूर्योदय से पहले नदी के किनारे आ जाना।”
अगली सुबह विवेक वहाँ पहुँचा। संत ने उसे एक मिट्टी का घड़ा दिया और कहा, “इसे पानी से भरकर पहाड़ी की चोटी तक ले जाओ, लेकिन ध्यान रहे कि एक बूंद भी पानी न गिरे।”
विवेक बहुत सावधानी से चलने लगा। उसका पूरा ध्यान घड़े पर था। किसी तरह वह पहाड़ी की चोटी तक पहुँच गया।
संत ने पूछा, “रास्ते में खिले हुए फूल देखे?”
विवेक ने कहा, “नहीं।”
“पेड़ों पर चहकते पक्षियों की आवाज सुनी?”
“नहीं।”
“सूर्योदय की सुंदरता देखी?”
“नहीं महाराज, मेरा पूरा ध्यान तो घड़े के पानी पर था।”
संत ने मुस्कुराकर कहा, “यही तुम्हारी जिंदगी है। तुम भविष्य के घड़े को बचाने में इतने व्यस्त हो कि वर्तमान के फूल, पक्षी और सूर्योदय देख ही नहीं पा रहे।”
विवेक चुप हो गया।
संत आगे बोले, “भविष्य की योजना बनाना बुद्धिमानी है, लेकिन उसकी चिंता में वर्तमान को खो देना मूर्खता है। जो किसान आज खेत में मेहनत करता है, उसका कल अपने आप बेहतर बनता है। जो विद्यार्थी आज मन लगाकर पढ़ता है, उसका भविष्य उज्ज्वल होता है। भविष्य का निर्माण आज के कर्मों से होता है, चिंताओं से नहीं।”
संत की बातें विवेक के हृदय में उतर गईं। उस दिन के बाद उसने निश्चय किया कि वह हर दिन को पूरी सजगता और उत्साह से जिएगा। उसने खेत में काम करते समय प्रकृति का आनंद लेना शुरू किया, परिवार के साथ समय बिताया और वर्तमान में रहकर अपना सर्वश्रेष्ठ देने लगा।
कुछ वर्षों बाद वह गाँव का सबसे सफल और प्रसन्न व्यक्ति बन गया। लोग उसकी सफलता का रहस्य पूछते तो वह मुस्कुराकर कहता—
“मैंने भविष्य की चिंता छोड़कर वर्तमान को जीना सीख लिया। जब आज अच्छा हो जाता है, तो कल अपने आप अच्छा बन जाता है।”
भविष्य की चिंता हमें कमजोर बनाती है, जबकि वर्तमान में किया गया कर्म हमारे भविष्य को मजबूत बनाता है। इसलिए कल की फिक्र में आज को मत खोइए, क्योंकि जीवन का सबसे अनमोल क्षण ‘आज’ ही है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
