त्रेता युग की बात है। जब रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले गया, तब भगवान श्रीराम अपनी पत्नी की खोज में वन-वन भटक रहे थे। उसी समय उनकी भेंट पवनपुत्र हनुमान जी से हुई। हनुमान जी ने पहली ही मुलाकात में श्रीराम को अपना सर्वस्व मान लिया और जीवन भर उनकी सेवा का संकल्प लिया।
जब यह पता चला कि माता सीता लंका में हैं, तब समुद्र पार करके उनका पता लगाने का कठिन कार्य हनुमान जी को सौंपा गया। समुद्र लगभग सौ योजन चौड़ा था। वानर सेना के अनेक वीर उस दूरी को पार करने में असमर्थ थे। हनुमान जी भी अपनी शक्ति भूल चुके थे। तब जामवंत जी ने उन्हें उनकी असली सामर्थ्य का स्मरण कराया।
जैसे ही हनुमान जी को अपनी शक्ति का बोध हुआ, उनका आत्मविश्वास जाग उठा। उन्होंने भगवान श्रीराम का स्मरण किया और एक विशाल पर्वत के समान रूप धारण कर समुद्र को लांघने के लिए छलांग लगा दी। मार्ग में अनेक बाधाएँ आईं। सुरसा ने उनका मार्ग रोका, सिंहिका ने उन्हें पकड़ने का प्रयास किया, लेकिन हनुमान जी ने अपनी बुद्धि, धैर्य और साहस से सभी बाधाओं को पार कर लिया।
लंका पहुँचकर उन्होंने माता सीता को अशोक वाटिका में खोज निकाला। श्रीराम की अंगूठी देकर उन्हें विश्वास दिलाया कि प्रभु शीघ्र ही उन्हें मुक्त कराने आएँगे। इसके बाद हनुमान जी ने रावण को समझाने का भी प्रयास किया, लेकिन उसके अहंकार ने उसे सत्य स्वीकार नहीं करने दिया।
जब रावण ने उनकी पूँछ में आग लगवाने का आदेश दिया, तब हनुमान जी ने उसी आग से पूरी लंका को जला दिया और सुरक्षित लौटकर श्रीराम को माता सीता का समाचार दिया। उनकी निष्ठा, साहस और समर्पण ने राम सेना को विजय का मार्ग दिखाया।
इस कथा से हमें महान शिक्षा मिलती है कि मनुष्य के भीतर अपार शक्तियाँ छिपी होती हैं, लेकिन वह अक्सर उन्हें पहचान नहीं पाता। जब कोई हमें हमारी क्षमता का बोध कराता है और हम स्वयं पर विश्वास करना सीख लेते हैं, तब असंभव दिखने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं।
हनुमान जी का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता केवल बल से नहीं, बल्कि भक्ति, विनम्रता, आत्मविश्वास और समर्पण से प्राप्त होती है। उन्होंने कभी अपनी शक्ति का अहंकार नहीं किया और हर सफलता का श्रेय भगवान श्रीराम को दिया।
“यदि मन में सच्ची श्रद्धा, लक्ष्य के प्रति समर्पण और स्वयं पर विश्वास हो, तो जीवन का कोई भी समुद्र इतना विशाल नहीं होता जिसे पार न किया जा सके। हनुमान जी की तरह अपनी शक्ति को पहचानिए, कठिनाइयों से मत घबराइए और अपने कर्तव्य पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहिए।”
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
