” शिक्षा प्रद कहानी– व्यवस्था का खेल “

घने जंगल में एक शेर ने एक फैक्ट्री शुरू की। उस फैक्ट्री में केवल एक ही जीव काम करता था—एक छोटी-सी मेहनती चींटी। वह रोज़ समय पर आती, पूरे मन से काम करती और बिना किसी शिकायत के अपना कार्य पूरा करके समय पर लौट जाती। उसके अनुशासन और परिश्रम से फैक्ट्री बहुत अच्छे ढंग से चल रही थी और शेर को अच्छा लाभ भी हो रहा था।

एक दिन शेर के मन में विचार आया—“जब यह चींटी अकेले इतना अच्छा काम कर रही है, तो यदि इसके ऊपर कोई विशेषज्ञ निगरानी रखे, तो काम और भी बेहतर हो सकता है।” यही सोचकर उसने एक मधुमक्खी को मैनेजर नियुक्त कर दिया।

मधुमक्खी अपने कार्य में निपुण थी। उसने आते ही कहा, “सबसे पहले हमें चींटी के काम की एक समय-सारणी बनानी होगी और उसके काम का पूरा रिकॉर्ड रखना होगा।” इसके लिए उसने एक सेक्रेटरी की मांग की। शेर ने तुरंत एक खरगोश को सेक्रेटरी बना दिया।

अब खरगोश दिनभर फाइलें बनाता, रिकॉर्ड तैयार करता और समय-सारणी लिखता रहता। शेर को यह सब देखकर बहुत अच्छा लगा। उसने कहा, “अब तक जो काम हुआ है उसकी रिपोर्ट बनाओ और प्रगति को ग्राफ में दिखाओ।”

मधुमक्खी ने उत्तर दिया, “इसके लिए हमें कंप्यूटर, प्रिंटर और प्रोजेक्टर की आवश्यकता होगी।” शेर ने तुरंत एक नया कंप्यूटर विभाग बना दिया और उसमें एक बिल्ली को नियुक्त कर दिया।

अब धीरे-धीरे स्थिति बदलने लगी। पहले जो चींटी सारा समय काम में लगाती थी, अब उसे हर कार्य के साथ रिपोर्ट भी बनानी पड़ती थी। उसका समय कागज़ी कार्यों में अधिक जाने लगा और उत्पादन धीरे-धीरे घटने लगा।

शेर को लगा कि कोई तकनीकी विशेषज्ञ होना चाहिए जो इन सब कार्यों की समीक्षा करे। उसने एक बंदर को तकनीकी विशेषज्ञ बना दिया। अब बंदर रोज़ मीटिंग करता, सुझाव देता और नए-नए नियम बनाता।

बेचारी चींटी दिन-रात मेहनत करती, लेकिन अब काम पूरा नहीं कर पाती। वह थककर अधूरा काम छोड़कर घर लौटने लगी। उधर फैक्ट्री का उत्पादन गिरता गया और शेर को घाटा होने लगा।

चिंतित होकर शेर ने एक उल्लू को बुलाया और उसे आदेश दिया कि वह इस नुकसान का कारण पता लगाए। उल्लू ने तीन महीने तक जांच की और फिर एक लंबी, गोपनीय रिपोर्ट शेर को सौंप दी।

रिपोर्ट में लिखा था—“फैक्ट्री में कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से अधिक है। खर्च कम करने के लिए कुछ कर्मचारियों को निलंबित, कुछ को नोटिस और कुछ को नौकरी से निकालना आवश्यक है।”

शेर ने बिना देर किए निर्णय लिया—और सबसे पहले उसने उस मेहनती चींटी को ही निकाल दिया।

और उसी दिन से फैक्ट्री पूरी तरह बंद हो गई।

 

यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी व्यवस्था में असली महत्व काम करने वालों का होता है, न कि अनावश्यक रूप से बढ़ाए गए प्रबंधन और कागज़ी प्रक्रियाओं का। जब हम वास्तविक श्रम करने वाले व्यक्ति के स्थान पर दिखावे, रिपोर्ट और नियमों को अधिक महत्व देने लगते हैं, तो कार्यक्षमता घटने लगती है और अंततः नुकसान होता है। अक्सर गलतियाँ ऊपरी स्तर की योजनाओं में होती हैं, लेकिन उसका दंड मेहनतकश व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, जो कि अन्यायपूर्ण है। इसलिए आवश्यक है कि हम सरल, संतुलित और व्यावहारिक व्यवस्था अपनाएँ, जहाँ श्रम का सम्मान हो, अनावश्यक बोझ न हो और हर व्यक्ति के योगदान को सही मूल्य दिया जाए।

*राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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