अशोक वाटिका की शांति में बैठी माता सीता अपने हाथों में पड़ी विवाह की अंगूठी को निहार रही थीं। उस अंगूठी को देखते ही उनके हृदय में अनेक भाव उमड़ने लगे। यह वही अंगूठी थी, जो उनके प्रिय स्वामी भगवान श्री राम ने स्वयं उनके हाथों में पहनाई थी—प्रेम, विश्वास और अटूट बंधन का प्रतीक।
किन्तु आज यह अंगूठी यहाँ, लंका की अशोक वाटिका में, उनके हाथों में कैसे आ गई—यही विचार उन्हें विचलित कर रहे थे। माता जानकी भली-भाँति जानती थीं कि प्रभु श्री राम को कोई भी युद्ध में पराजित नहीं कर सकता। वे यह भी जानती थीं कि इस दिव्य अंगूठी का कोई मायावी प्रतिरूप नहीं बना सकता। फिर यह यहाँ कैसे पहुँची? कौन लाया? किसने दी? और क्यों दी?
उनका मन आशंका और आश्चर्य के बीच झूलने लगा। कहीं यह कोई छल तो नहीं? कहीं रावण की कोई नई चाल तो नहीं? परंतु उनके हृदय की गहराइयों में एक विश्वास भी था—राम का नाम, राम का चिन्ह कभी असत्य नहीं हो सकता।
इन्हीं विचारों में डूबी माता सीता की दृष्टि अचानक सामने खड़े एक छोटे से वानर पर पड़ी। वह विनम्रता से हाथ जोड़कर खड़ा था, पर उसकी आँखों में अपार भक्ति और तेज झलक रहा था। माता सीता ने उसे ध्यान से देखा, लेकिन मन का संशय अभी भी समाप्त नहीं हुआ।
तभी उस वानर ने अपने मधुर स्वर में धीरे-धीरे “राम… राम…” का उच्चारण प्रारम्भ किया। वह स्वर इतना पवित्र, इतना मधुर और इतना भावपूर्ण था कि जैसे स्वयं अयोध्या की पवन वहाँ बहने लगी हो। हर “राम” के साथ माता सीता का हृदय आश्वस्त होने लगा, उनकी आँखों में आशा की ज्योति चमक उठी।
वह कोई साधारण वानर नहीं था—वह थे श्री हनुमान, प्रभु श्री राम के परम भक्त, उनके दूत, और उनकी अटूट शक्ति का स्वरूप।
हनुमान जी ने विनम्र स्वर में कहा, “माता, मैं प्रभु श्री राम का दास हूँ। यह अंगूठी उन्हीं ने आपके पास भेजी है, आपके कुशल समाचार जानने और आपको यह विश्वास दिलाने के लिए कि वे शीघ्र ही आपको यहाँ से मुक्त कराने आएंगे।”
यह सुनते ही माता सीता की आँखों से आँसू बहने लगे—वियोग के नहीं, बल्कि आशा और विश्वास के। उनका हृदय प्रसन्नता से भर गया। अब उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि उनके राम उन्हें अवश्य लेने आएंगे।
अशोक वाटिका, जो अब तक उनके लिए दुःख और प्रतीक्षा का स्थान थी, अचानक आशा और विश्वास से भर उठी। और उस पावन क्षण में केवल एक ही ध्वनि गूंज रही थी—
“राम राम …”
इस कहानी से हमें गहरी और प्रेरणादायक शिक्षा मिलती है
जब जीवन में परिस्थितियाँ कठिन हो जाती हैं और चारों ओर अंधकार दिखाई देता है, तब भी विश्वास नहीं छोड़ना चाहिए। जैसे माता सीता ने विपरीत परिस्थितियों में भी भगवान श्री राम पर अपना अटूट भरोसा बनाए रखा, वैसे ही हमें भी अपने ईश्वर और सत्य पर विश्वास रखना चाहिए।
यह कथा यह भी सिखाती है कि सच्चे भक्त और सच्चे संबंध कभी टूटते नहीं। श्री हनुमान की तरह सच्चे दूत और सहायक हमेशा सही समय पर हमारी मदद के लिए आते हैं, बस हमें धैर्य और विश्वास बनाए रखना होता है।
विश्वास, धैर्य और सच्ची भक्ति से हर संकट का अंत निश्चित है, और ईश्वर अपने भक्तों की सहायता अवश्य करते हैं।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
