एक गाँव में एक बहुत धनी किसान रहता था। उसके पास खेत-खलिहान, पशु, धन-दौलत और नौकर-चाकरों की कोई कमी नहीं थी। यह सारी संपत्ति उसे अपने पूर्वजों से विरासत में मिली थी। अधिक धन होने के कारण वह बेहद आलसी हो गया था। उसका अधिकांश समय घर में बैठे-बैठे हुक्का पीने और आराम करने में बीतता था। खेती-बाड़ी और घर की व्यवस्था पर उसका बिल्कुल ध्यान नहीं रहता था।
किसान की इसी लापरवाही का फायदा उसके नौकर और रिश्तेदार उठाने लगे। कोई अनाज चुरा लेता, तो कोई दूध और घी में गड़बड़ी करता। रिश्तेदार भी मीठी बातें बनाकर धीरे-धीरे उसका धन हड़पने में लगे रहते। किसान को इन बातों की कोई खबर नहीं थी।
एक दिन उसका पुराना मित्र उससे मिलने आया। उसने किसान के घर और खेतों की बुरी हालत देखी तो बहुत दुखी हुआ। उसने किसान को समझाया कि यदि वह इसी तरह आलसी बना रहा, तो एक दिन उसकी सारी संपत्ति नष्ट हो जाएगी। लेकिन किसान पर उसकी बातों का कोई असर नहीं पड़ा।
कुछ दिनों बाद मित्र ने किसान से कहा, “मैं तुम्हें एक ऐसे महात्मा के पास ले चलूँगा, जो धन बढ़ाने का अद्भुत उपाय बताते हैं।” धन बढ़ाने की बात सुनकर किसान तुरंत तैयार हो गया।
दोनों महात्मा के पास पहुँचे। महात्मा ने किसान से कहा, “हर रोज सूर्योदय से पहले एक दिव्य हंस आता है। जो व्यक्ति उस हंस के दर्शन कर लेता है, उसका धन निरंतर बढ़ता रहता है। लेकिन वह हंस किसी के देखने से पहले ही गायब हो जाता है।”
अगली सुबह किसान पहली बार सूरज निकलने से पहले उठा और हंस को खोजने खलिहान की ओर गया। वहाँ उसने देखा कि उसका एक रिश्तेदार बोरे में अनाज भरकर चोरी से ले जा रहा है। किसान ने उसे पकड़ लिया। वह शर्मिंदा होकर माफी मांगने लगा।
फिर किसान गौशाला पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि एक नौकर दूध चुरा रहा है और पूरे स्थान पर गंदगी फैली हुई है। किसान ने नौकरों को डांटा और सफाई तथा ईमानदारी से काम करने का आदेश दिया।
अब किसान रोज जल्दी उठने लगा। वह खेतों, खलिहानों और गौशाला का निरीक्षण करता। उसकी सतर्कता देखकर नौकर और रिश्तेदार भी डर गए और अपने काम ईमानदारी से करने लगे। खेतों की उपज बढ़ने लगी, चोरी बंद हो गई और किसान का स्वास्थ्य भी पहले से अच्छा हो गया।
कुछ महीनों बाद किसान फिर महात्मा के पास पहुँचा और बोला, “महाराज! मुझे अब तक वह हंस दिखाई नहीं दिया, लेकिन मेरा धन लगातार बढ़ता जा रहा है।”
महात्मा मुस्कुराए और बोले, “तुमने उस हंस के दर्शन कर लिए हैं, लेकिन पहचान नहीं पाए। वह हंस कोई पक्षी नहीं, बल्कि ‘परिश्रम’ है। मेहनत और जागरूकता ही असली धन बढ़ाने वाले हंस हैं।”
किसान को अपनी भूल समझ में आ गई। उस दिन के बाद उसने आलस्य छोड़ दिया और मेहनत को अपना सबसे बड़ा साथी बना लिया।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, जबकि परिश्रम सफलता और समृद्धि की कुंजी है। केवल धन होने से जीवन सुरक्षित नहीं होता, बल्कि उसकी देखभाल और मेहनत जरूरी होती है। जो व्यक्ति समय पर जागरूक होकर ईमानदारी और लगन से काम करता है, उसके जीवन में सुख, स्वास्थ्य और समृद्धि अपने आप आने लगते हैं।
- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
