” पच्चीसवीं मंज़िल “

पच्चीसवीं मंज़िल… ऊँचाई पर फैला हुआ शहर रोशनियों से जगमगा रहा था। कमरे में फैली लाल गुलाबों की हल्की-हल्की महक जैसे हर कोने में कोई अनकहा वादा सजा रही थी। शीशे की बड़ी खिड़की के सामने खड़ी मीरा ने अपनी लाल साड़ी का पल्लू ठीक किया। आज उसकी शादी की सालगिरह थी।

दिल धड़क रहा था… उम्मीदों के साथ।

उसने पूरी शाम खास बनाई थी — मोमबत्तियाँ, केक, उनकी पसंदीदा संगीत प्लेलिस्ट… सब। पर एक चीज़ अब तक नहीं आई थी — उसका पति आर्यन।

घड़ी बार-बार उसे समय का एहसास करा रही थी।

रात के दस बज चुके थे।

मीरा ने मोबाइल उठाया और आर्यन को कॉल लगाया। कॉल बार-बार “व्यस्त” जा रही थी। अचानक उसने तय किया कि वह आर्यन की सेक्रेटरी रोशनी को कॉल करेगी।

“मैम, सर तो होटल ‘एमराल्ड ग्रीन’ में हैं मीटिंग के लिए,” रोशनी ने सहजता से कहा।

मीरा ठिठक गई।

वह खुद भी उसी होटल में थी। वही 25वीं मंज़िल। लेकिन उसे यह नहीं बताया गया था कि आर्यन भी यहीं है।

दिल में सवाल उमड़ आए — अगर वह यहीं है, तो मेरे पास क्यों नहीं आया?
रोशनी से कमरे का नंबर पूछना उसे सही नहीं लगा, पर किस्मत जैसे उसे रास्ते पर ले जा रही थी।

लॉबी से गुजरते हुए उसे रिसेप्शन के पास टेबल पर रखी रजिस्टर कॉपी में एक झलक दिखाई दी —
आर्यन मल्होत्रा — कमरा 568

पर जब वह 568 पहुँची तो वहाँ सफाई कर्मचारी खड़ा था।

“मैडम, 568 के बाजू वाला कमरा 567 में तो कोई है… बहुत देर से,” उसने सहजता से कहा।

बस, इतना सुराग काफी था।

कमरा 567 का दरवाज़ा आधा खुला था।

अंदर से हँसी की धीमी आवाजें… आवाज़ों के बीच एक जानी-पहचानी हँसी। मीरा ठिठक गई। दिल बेकाबू धड़क रहा था। हाथ कांपते हुए उसने दरवाज़े को हल्का सा धकेला।

उसने जो देखा, उसके बाद उसके पैरों के नीचे की ज़मीन जैसे खिसक गई।

उसका पति आर्यन…
और उसकी अपनी बहन सान्या…
एक-दूसरे की बाँहों में।

“तुम कब उस बेचारी मीरा को तलाक दोगे? उससे झूठ बोलते-बोलते मैं थक चुकी हूँ,” सान्या ने मीठी आवाज़ में कहा।

आर्यन ने हँसते हुए जवाब दिया—
“तलाक? वो तो मेरे लिए बस घर की नौकरानी है। काम करती है, चुप रहती है, रोती भी चुपचाप… ऐसे लोग जिंदगी भर इस्तेमाल करने के लिए होते हैं, जीने के लिए नहीं।”

मीरा का संसार उसी पल चकनाचूर हो गया।
आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा।
उसके अपने ही… उसकी पीठ में खंजर घोंप रहे थे।

पर वह ढही नहीं।
टूटी जरूर, मगर खत्म नहीं हुई।

वह चुपचाप लौट आई।

उस रात मीरा ने अपने टूटे हुए दिल पर हाथ रखकर फैसला किया —
वह बदला लेगी। लेकिन चीखकर नहीं, मुस्कुराकर।

अगले कुछ दिनों में उसने खुद को संभाल लिया। रोई… पर अकेले। किसी से शिकायत नहीं की। यहाँ तक कि आर्यन के सामने भी सामान्य व्यवहार करती रही। यह शांत चेहरा ही उसका सबसे बड़ा हथियार था।

मीरा पढ़ी-लिखी थी। चार्टर्ड अकाउंटेंट। पर शादी के बाद आर्यन ने उसे घर तक सीमित कर दिया था।
उसने अपने पुराने ऑफिस में दोबारा ज्वाइन कर लिया। उसके काम करने का फैसला आर्यन को अच्छा नहीं लगा, पर मीरा अब उससे अनुमति नहीं माँगती थी।

धीरे-धीरे उसने बिखरी ज़िंदगी को नए सिरे से बुनना शुरू किया। भीतर धधकती आग उसे मजबूत बना रही थी।

एक दिन उसने सान्या को फोन करके कहा—

“संडे को घर आ जाना। तुम्हारे लिए सरप्राइज है।”

आवाज़ में ऐसी मिठास थी कि सान्या को शक तक नहीं हुआ।

 

संडे आया।

ड्रॉइंग रूम में आर्यन, सान्या और मीरा — तीनों मौजूद थे। टेबल पर कुछ फाइलें रखी थीं। मीरा ने बहुत शांति से कहा—

“आज मैं तुम दोनों को बधाई देने आई हूँ।”

दोनों चौंके।

“बधाई?” आर्यन हंसा, “किस बात की?”

मीरा ने फाइलें उनकी ओर बढ़ाईं—

“ये आर्यन मल्होत्रा के सभी बैंक खातों और प्रॉपर्टी के ट्रांसफर पेपर्स हैं। कंपनी के 60 प्रतिशत शेयर, फार्महाउस, दो फ्लैट… सब मेरे नाम पर।”

आर्यन के चेहरे का रंग उड़ गया।

“ये मज़ाक मत करो मीरा!”

मीरा मुस्कुराई—

“मज़ाक नहीं। तुम भूल गए… कंपनी की फाइनेंस हेड कभी मैं ही थी। और तुमने एक बार खुद कहा था कि तुम साइन किए बिना पढ़ते नहीं।”

उसे वो रात याद आ गई, जब उसने मीरा के आगे कई कागज़ बढ़ा दिए थे—
और उसने मुस्कुराते हुए साइन कर दिए थे, यह समझकर कि वो बिज़नेस पेपर्स हैं।

आज वही कागज़ तलवार बन चुके थे।

सान्या हकलाने लगी—

“मीरा… हम… वो…”

मीरा की आँखें पहली बार तेज़ हुईं।

“बस। एक शब्द नहीं। मेरे पास सबूत भी हैं— वीडियो, रिकॉर्डिंग्स, होटल फुटेज। तुम्हारी बातें। तुम्हारी बाँहें। तुम लोगों का सच।”

आर्यन कुर्सी पर गिर पड़ा।

मीरा के भीतर वर्षों से दबा आक्रोश लावा बनकर बाहर आने लगा—
पर उसकी आवाज ठंडी थी।

“तुमने मुझे नौकरानी कहा था, न?
आज तुम्हारी हर चीज मेरी है।
घर, कार, ऑफिस… यहाँ तक कि तुम्हारा लिया हुआ हर कर्ज भी।”

सान्या के हाथ काँप गए।

“मीरा, प्लीज़… माफ़ कर दो, मैं तुम्हारी बहन हूँ…”

मीरा मुस्कुराई—

“बहन? बहन वो होती है जो साथ खड़ी रहे, न कि पीछे से पति छीन ले।”

वह उठी, और बेहद शांति से बोली—

“मैंने तलाक के पेपर भी भेज दिए हैं।
सिर्फ इतना समझ लो— मैं टूटी नहीं हूँ।
बदली हूँ।”

वह दरवाजे की तरफ बढ़ी।
पीछे दो सन्न पड़े चेहरे।

दरवाजा बंद करते हुए उसने अंतिम बार कहा—

“अब मैं अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जिऊँगी। और हाँ… अब से तुम्हारे लिए मैं वही हूँ जो तुमने कहा था — ‘नौकरानी’— मगर अपने सपनों की, अपने साहस की, अपनी जीत की।”

आज महीनों बाद मीरा उसी पच्चीसवीं मंज़िल पर खड़ी थी।
लेकिन इस बार अकेली नहीं — अपने आत्मसम्मान के साथ।

वही शहर था
वही रोशनियाँ थीं
पर मीरा बदल चुकी थी।

हवा में गुलाब की खुशबू फिर तैर रही थी।
वह मुस्कुराई और धीरे से बोली—

“दर्द ने मुझे तोड़ा नहीं… गढ़ दिया।”

और इस बार —
कोई उसका इंतज़ार नहीं करवा रहा था।

——- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

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