“मम्मी, कहाँ रह गईं? कितनी देर हो रही है!” विलास ने जोर से आवाज लगाई। रविवार का दिन था। रिमझिम बारिश पड़ रही थी और पिकनिक की योजना बनी थी। बच्चे बहुत उत्साहित थे और पूरी तैयारी करके बाहर खड़े थे।
“आ रही हूँ, बस अभी!” कहते हुए वीना जी एक टूटा-फूटा छाता हाथ में लेकर बाहर आईं। अबकी बार झुंझलाने की बारी विनिता की थी।
“मम्मी! हमें तो कार से पिकनिक पर जाना है, इस टूटे छाते का क्या काम?”
वीना जी ने बिना कुछ कहे मुस्कुरा दिया और वह छाता उन बुजुर्ग बाबा को दे दिया, जो थोड़ी दूर खड़े अपने छोटे से संदूक जैसे बॉक्स के साथ छाते ठीक कर रहे थे। बाबा पूरे मन से छाता सुधारने में लग गए। इधर बच्चे पिकनिक लेट होने से खीझ रहे थे और पापा हल्की मुस्कान के साथ चुप थे—उन्हें वीना जी की आदत भली-भाँति पता थी।
वे समझ रहे थे कि छाता ठीक कराने के बाद वीना जी बाबा को थोड़े पैसे अधिक देंगी, हाल-चाल पूछेंगी, संभव हुआ तो कुछ खाने को भी देंगी, और फिर यह छाता किसी जरूरतमंद को दान कर देंगी।
कुछ ही देर में छाता ठीक हो गया। वीना जी ने अपने नियम के अनुसार पैसे दिए, स्नेह से बात की और सभी कार में बैठ गए। रास्ते में विनिता खुद को रोक न सकी—
“मम्मी, इस समय छाता ठीक कराने की क्या जरूरत थी? आधा घंटा खराब हो गया!”
वीना जी शांत स्वर में बोलीं, “बेटा, हम सब पेट भर नाश्ता करके बारिश का मजा लेने जा रहे हैं। लेकिन क्या तुमने सोचा कि वो बाबा शायद आज के खाने के लिए पैसे जुटाने निकले होंगे? अगर हम छाता ठीक न करवाते तो उनका काम और कमाई दोनों कम हो जाती। मैंने छाता इसलिए सुधरवाया ताकि उन्हें मेहनत की कमाई मिले और उनका स्वाभिमान भी बना रहे। हमें जब भी अवसर मिले, ऐसे जरूरतमंद लोगों की मदद करनी चाहिए।”
विलास और विनिता चुप थे, लेकिन अब उनकी चुप्पी में समझदारी थी। पापा मुस्कुराते हुए गाड़ी चलाते रहे। उन्हें भरोसा था कि आगे से बच्चे खुद ही ऐसे कामों में आगे रहेंगे। कार अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रही थी और मौसम अब और भी सुहाना लग रहा था।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि सच्ची मदद वही होती है जो किसी के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाए बिना की जाए। छोटी-सी संवेदनशीलता भी किसी के जीवन में बड़ी राहत बन सकती है। हमें केवल अपने आनंद और सुविधा के बारे में ही नहीं, बल्कि समाज के कमजोर और जरूरतमंद लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए। दान केवल पैसे देना नहीं है—सम्मान, संवेदना और अवसर देना भी उतना ही बड़ा दान है।
— राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
