” ज़िंदगी “

रात के दो बजे का सन्नाटा था। सड़क के उस पार एक चाय का ठेला अब बुझ चुका था। हल्की ठंडी हवा चल रही थी, और उसी सड़क के किनारे पुराने बेंच पर देव बैठा आसमान की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। उसकी आँखों में नींद नहीं, दर्द था। होंठों पर बस एक खामोश अरदास थी —
“ए ज़िन्दगी, तू भी कभी माँ जैसी बन जा… ज़रा सी माँगूँ तो बाँहों में पूरा जहाँ दे दे।”

देव की ज़िन्दगी बहुत छोटी उम्र में ही बदल गई थी। जब वह बारह साल का था, तभी माँ दुनिया छोड़ गई। पिता ने ग़म भुलाने के लिए शराब का सहारा लिया, और घर का सारा बोझ देव के कंधों पर आ गया। बचपन की मासूम हँसी अब ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दब चुकी थी।

दिन में कॉलेज, शाम को होटल में वेटर का काम, और रात को ऑनलाइन क्लास। देव के लिए ज़िन्दगी अब एक युद्ध थी। वो हर दिन लड़ता था — वक़्त से, हालात से, और कभी-कभी खुद से भी।

एक रात जब होटल के मैनेजर ने उसे झूठे आरोप में नौकरी से निकाल दिया, तो देव का सब्र टूट गया। वो सड़क पर भटकता हुआ उसी मोड़ तक चला गया, जहाँ कभी बचपन में माँ उसका हाथ पकड़कर स्कूल छोड़ने जाया करती थी। बेंच पर बैठते ही आँखें भर आईं —
“माँ… तू होती तो शायद कहती — मत डर बेटा, मैं हूँ यहाँ…”

वो देर तक आसमान की तरफ देखता रहा। उसी वक्त हवा का एक झोंका उसके चेहरे से टकराया। उसे लगा जैसे माँ ने माथे पर हाथ रखा हो। कानों में वही जानी-पहचानी आवाज़ गूँज उठी —
“बेटा, ज़िन्दगी ठोकर नहीं देती, रास्ता दिखाती है। हर दर्द एक सबक है, हर गिरना सिखाता है कि कहाँ संभलना है।”

देव ने आँखें पोंछीं और खुद से कहा —
“अब और नहीं टूटूंगा। माँ अगर ऊपर से देख रही होगी तो चाहेगी कि मैं कुछ बनूँ।”

अगले दिन उसने अपनी पुरानी डायरी और स्केचबुक निकाली — वो जिसे उसने सालों से नहीं छुआ था। माँ कहा करती थी, “तेरे हाथों में हुनर है बेटा, रंगों से तू कहानियाँ लिख सकता है।”

देव ने छोटे-छोटे स्केच बनाने शुरू किए, फिर उन्हें सोशल मीडिया पर डालने लगा। शुरुआत में किसी ने ध्यान नहीं दिया, पर उसने हार नहीं मानी। कुछ ही महीनों में उसकी कला लोगों के दिलों तक पहुँचने लगी। एक दिन उसे एक बड़े आर्ट गैलरी से कॉल आया — “देव, हम तुम्हारी पेंटिंग्स को प्रदर्शित करना चाहते हैं।”

वो पल देव के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। वह आसमान की तरफ देखकर बोला —
“देखा माँ, तूने कहा था ना — ज़िन्दगी भी माँ जैसी बन सकती है, बस उसे पहचानना सीखो…”

उसकी पहली प्रदर्शनी के दिन दीवारों पर टंगी हर पेंटिंग एक कहानी कह रही थी — दर्द, संघर्ष, उम्मीद और ममता की। और हर फ्रेम के नीचे लिखा था —
*“जो माँ से बढ़कर चाहत हो, वही असली ज़िन्दगी है।”*

शाम को जब भीड़ कम हुई, देव बाहर आया। ठंडी हवा चल रही थी। उसने आसमान की ओर देखा — तारे ऐसे चमक रहे थे जैसे कोई आँखों से आशीर्वाद दे रहा हो।

और तभी उसे महसूस हुआ —
जैसे किसी ने फुसफुसाकर कहा हो —
*“मत डर बेटा, मैं हूँ यहाँ…”*

देव की आँखों से आँसू बह निकले, पर इस बार उनमें दर्द नहीं था, सुकून था।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था — *ज़िन्दगी ठोकर नहीं देती, रास्ता बनाती है। और जब इंसान हार मानने ही वाला होता है, तभी वो माँ बनकर उसे गले लगा लेती है।

——– राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *