जैसे रहता है पूर्णिमा का चाँद
तुम मेरे हृदय की शांति में निवास करोगी
आश्चर्य में डूबे मुझ पर
तुम्हारी उदास आँखें
निगाह रखेंगी
तुम्हारे घूँघट की छाया
मेरे हृदय पर टिकी रहेगी
गर्मी की रातों में पूरे चाँद की तरह खिलती
तुम्हारी साँसें, उन्हें सुगंधित बनातीं
मेरे स्वप्नों का पीछा करेंगी !
—- प्रसिद्ध कवि रवींद्रनाथ टैगोर
( संकलित )
—— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

