” मेरी प्यारी बेटी “

गाँव के किनारे एक टूटी-फूटी झोपड़ी में रामू अपनी पत्नी सीता और आठ साल की बेटी गुड़िया के साथ रहता था। गरीबी इतनी थी कि कई बार रात को तीनों केवल पानी पीकर सो जाते। लेकिन उस छोटी सी झोपड़ी में गुड़िया की हँसी किसी मंदिर की घंटियों जैसी गूंजती रहती थी।

गुड़िया बहुत समझदार थी। खुद भूखी रह जाती, मगर माँ-बाप के चेहरे पर उदासी नहीं देख सकती थी। कभी माँ के सिर में तेल लगा देती, कभी पिता के फटे कपड़े सी देती। रामू उसे देखता तो मन ही मन सोचता — “काश मैं अपनी बेटी को सारी खुशियाँ दे पाता।”

लेकिन वक्त के थपेड़ों ने रामू और सीता को अंदर से तोड़ दिया था।

एक रात सीता रोते हुए बोली,
“हमसे अपना पेट नहीं भरता… कल को बेटी बड़ी होगी, उसकी शादी कैसे करेंगे? लोग दहेज माँगेंगे, कपड़े माँगेंगे… हम क्या देंगे?”

रामू चुप रहा। उसकी आँखें भीग गईं। बहुत देर तक दोनों बैठे रहे। फिर गरीबी ने इंसानियत को हरा दिया। भारी दिल से उन्होंने फैसला कर लिया कि सुबह गुड़िया को जंगल ले जाकर मार देंगे।

अगली सुबह सीता ने पहली बार अपनी बेटी को बड़े प्यार से नहलाया। उसके बाल संवारे, माथा चूमा, अपनी पुरानी साड़ी का साफ हिस्सा काटकर उसके लिए रिबन बनाया।

गुड़िया मासूमियत से बोली,
“माँ, आज इतना प्यार क्यों कर रही हो? क्या मुझे कहीं दूर भेज रही हो?”

सीता कुछ न बोल सकी। उसका गला भर आया। उसने बेटी को कसकर सीने से लगा लिया।

थोड़ी देर बाद रामू हाथ में फावड़ा और चाकू लेकर आया। उसकी आँखें नीचे झुकी थीं। वह बिना कुछ बोले गुड़िया को साथ लेकर चल पड़ा।

रास्ते भर गुड़िया खुश होकर बातें करती रही, लेकिन रामू के कदम भारी थे। तभी अचानक उसके पैर में बड़ा काँटा चुभ गया। दर्द से वह वहीं बैठ गया।

गुड़िया तुरंत दौड़कर आई। उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से काँटा निकाला और अपनी फटी चुनरी का टुकड़ा फाड़कर पिता के पैर पर बाँध दिया।

“अब दर्द कम हो जाएगा पिताजी…” उसने मासूम मुस्कान के साथ कहा।

रामू का दिल काँप उठा।

दोनों जंगल पहुँचे। रामू काँपते हाथों से गड्ढा खोदने लगा। पसीना उसके चेहरे से बह रहा था। गुड़िया दूर बैठी उसे देखती रही। फिर धीरे से पास आई और अपनी चुनरी से उसका पसीना पोंछने लगी।

रामू ने खुद को कठोर दिखाने के लिए उसे दूर धकेल दिया। लेकिन गुड़िया फिर भी मुस्कुराई।

कुछ देर बाद जब रामू थककर बैठ गया, तो गुड़िया फावड़ा उठाते हुए बोली,

“पिताजी, आप थक गए हो ना? लाओ, मैं खोद देती हूँ… मुझसे आपकी तकलीफ नहीं देखी जाती।”

बस… इतना सुनना था कि रामू के भीतर का पत्थर टूट गया।

फावड़ा उसके हाथ से गिर पड़ा। वह जोर-जोर से रोने लगा। उसने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया।

“बेटी… मुझे माफ कर दे। मैं यह गड्ढा तेरे लिए खोद रहा था… लेकिन तू तो मेरी जान है। जो बेटी अपने पिता का दर्द नहीं देख सकती, उसे कोई बाप कैसे मार सकता है?”

गुड़िया कुछ समझ नहीं पाई, मगर उसने अपने नन्हे हाथों से पिता के आँसू पोंछ दिए।

उस दिन रामू खाली हाथ घर लौटा, लेकिन उसका दिल बदल चुका था। उसने सीता से कहा,

“हम गरीब जरूर हैं, मगर हमारी बेटी हमारा अभिशाप नहीं, भगवान का आशीर्वाद है। मैं मजदूरी करूँगा, भूखा रहूँगा, लेकिन अपनी बेटी को कभी दुख नहीं दूँगा।”

उस रात पहली बार उनकी झोपड़ी में गरीबी नहीं, इंसानियत जीती थी।

 

बेटियाँ बोझ नहीं होतीं, वे तो भगवान का दिया सबसे अनमोल उपहार होती हैं।
बेटा भाग्य से मिलता है, लेकिन बेटी सौभाग्य से मिलती है…!

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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