” परमात्मा पर विश्वास “


हिमालय की गोद में स्थित एक पवित्र तीर्थस्थल के समीप एक संत अपनी कुटिया में निवास करते थे। वे जन्म से ही नेत्रहीन थे। उनकी आँखों में संसार को देखने का प्रकाश भले ही नहीं था, लेकिन उनके अंतर्मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का प्रकाश सदैव जलता रहता था।

संत का प्रतिदिन एक नियम था। संध्या होते ही वे अपनी कुटिया से निकलते और पर्वतीय मार्गों पर भ्रमण करते हुए भगवान के नाम का स्मरण करते रहते। ऊँचे-ऊँचे पर्वत, घने वन और गहरी घाटियाँ उनके मार्ग में आतीं, लेकिन उनके कदम कभी नहीं रुकते थे।

एक दिन उनके एक शिष्य ने विनम्रता से पूछा,

“गुरुदेव! आप प्रतिदिन इतने दुर्गम पर्वतीय मार्गों पर अकेले भ्रमण करने निकल जाते हैं। आपको दिखाई भी नहीं देता। इन रास्तों पर गहरी खाइयाँ हैं, ऊँची चट्टानें हैं और कहीं-कहीं मार्ग भी बहुत सँकरा है। यदि चलते समय आपका पैर फिसल जाए तो क्या होगा? क्या आपको भय नहीं लगता?”

संत मुस्कुराए, लेकिन उस समय उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

संध्या के समय उन्होंने शिष्य से कहा, “आज तुम मेरे साथ चलो।”

दोनों पर्वतीय मार्ग पर आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर जाने के बाद संत ने कहा,

“जब हमारे सामने कोई गहरी खाई आए, तो मुझे बता देना।”

दोनों आगे बढ़ते रहे। कुछ समय बाद शिष्य ने देखा कि सामने एक अत्यंत गहरी खाई थी। उसने तुरंत कहा,

“गुरुदेव, सामने गहरी खाई है।”

संत ने शांत स्वर में कहा,

“अच्छा, तो मुझे इस खाई में धक्का दे दो।”

शिष्य यह सुनकर घबरा गया।

उसने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव! मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? आप मेरे गुरु हैं। मैं तो अपने किसी शत्रु को भी जानबूझकर मृत्यु के मुख में नहीं धकेल सकता।”

संत ने फिर कहा, “यह मेरी आज्ञा है। मुझे खाई में धक्का दे दो।”

शिष्य की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा,

“गुरुदेव, यदि आपकी आज्ञा न मानने से मुझे कोई दंड भी मिले, तो मैं स्वीकार कर लूँगा, लेकिन आपको खाई में नहीं धकेल सकता।”

संत मंद-मंद मुस्कुराए और बोले,

“वत्स! जब तुम जैसे एक साधारण मनुष्य के भीतर भी मुझे गिरने से बचाने की भावना है, तो क्या तुम्हें लगता है कि मेरा परमात्मा मुझे गिरने देगा?”

शिष्य मौन हो गया।

संत ने आगे कहा,

“जिस परमात्मा पर मैंने अपना जीवन समर्पित कर दिया है, वह हर क्षण मेरे साथ है। वह किसी को गिरते हुए देखकर प्रसन्न नहीं होता। वह तो गिरे हुए को उठाता है, भटके हुए को मार्ग दिखाता है और निराश मनुष्य को आशा देता है।”

“हमें अपने जीवन में अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ दिखाई देंगी, जहाँ आगे का मार्ग दिखाई नहीं देगा। कभी संकट गहरी खाई जैसा लगेगा, कभी समस्याएँ पर्वत जैसी लगेंगी। लेकिन यदि मन में ईश्वर के प्रति सच्चा विश्वास हो, तो हमें यह भरोसा रखना चाहिए कि हम अकेले नहीं हैं।”

शिष्य ने गुरु के चरणों में सिर रख दिया।

उस दिन उसे समझ आया कि ईश्वर पर विश्वास का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कठिनाइयाँ कभी आएँगी ही नहीं; बल्कि इसका अर्थ है कि कठिनाइयों के बीच भी हमारा विश्वास नहीं टूटेगा।

जिसके हृदय में सच्ची श्रद्धा और विश्वास है, उसके लिए अंधकार में भी ईश्वर मार्गदर्शक बन जाता है।

ईश्वर हमें हर संकट से पहले नहीं बचाता,
लेकिन संकट के बीच हमारा हाथ कभी नहीं छोड़ता।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार          !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *