” सदा सुहागन रहो “

मीना की दादी जब भी गाँव से शहर आतीं, मीना की माँ किरन उनके चरण स्पर्श करती। दादी उसके सिर पर हाथ रखकर हमेशा एक ही आशीर्वाद देतीं—
“सदा सुहागन रहो, बेटी।”

मीना यह बात बचपन से देखती आई थी। एक दिन उससे रहा नहीं गया। उसने माँ से पूछा,
“मम्मी, दादी आपको हमेशा यही आशीर्वाद क्यों देती हैं? वे यह भी तो कह सकती हैं कि सुखी रहो, खुश रहो। ‘सदा सुहागन रहो’ कहकर तो वे सीधे-सीधे अपने बेटे के लंबे जीवन की कामना करती हैं।”

किरन मुस्कुराकर बोली, “बेटी, इसमें गलत क्या है? उनके बेटे मेरे पति हैं। मेरे जीवन का सुख उनसे जुड़ा है।”

मीना तुरंत बोली, “तो क्या औरत का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता?”

किरन ने समझाते हुए कहा, “ऐसा नहीं है। लेकिन पति-पत्नी एक-दूसरे के जीवन के सहारे होते हैं। पति का साथ पत्नी के लिए सुरक्षा और भावनात्मक सहारा बन जाता है। अभी तुम छोटी हो, इसलिए इन बातों को पूरी तरह नहीं समझोगी।”

मीना चुप हो गई, लेकिन उसके मन में सवाल घूमते रहे। उसने सोचा, “पति कोई भगवान थोड़े ही है कि उसकी पसंद का खाना बनाओ, उसकी पसंद के कपड़े पहनो और हर बात पूछकर करो। मैं तो शादी के बाद बराबरी से रहूँगी। सम्मान मिलेगा तो सम्मान दूँगी।”

समय बीता और मीना की शादी नील से हो गई।

नील बहुत समझदार और प्रेम करने वाला पति था। वह मीना की छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता। धीरे-धीरे मीना भी नील की पसंद-नापसंद को अपनी खुशी समझने लगी। उसकी पसंद की सब्जी बनाना, उसके लिए कपड़े चुनना और उसके साथ समय बिताना उसे अच्छा लगने लगा।

अब जब किरन अपनी बेटी को फोन करती तो मीना अपनी बातों से ज्यादा नील की बातें करती। कभी कहती, “माँ, आज नील के लिए उसकी पसंद का खाना बनाया।” तो कभी कहती, “माँ, नील मुझे कहीं घुमाने ले जाने वाला है।”

किरन यह सुनकर मुस्कुरा देती। उसे अपनी बेटी की पुरानी बातें याद आतीं और मन ही मन सोचती—“जिस बेटी को लगता था कि पति के बिना औरत का कोई सहारा नहीं, आज उसी का पति उसकी खुशियों का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है।”

कुछ समय बाद उनके घर एक प्यारा-सा बेटा हुआ, जिसका नाम उन्होंने अंश रखा।

लेकिन अंश अभी एक वर्ष का भी नहीं हुआ था कि नील का भयानक सड़क हादसा हो गया। वह गंभीर रूप से घायल हो गया। चेहरे को छोड़कर उसका लगभग पूरा शरीर पट्टियों से बंधा था।

मीना का रो-रोकर बुरा हाल था। वह नील को देखकर टूट जाती और फिर छोटे अंश को सीने से लगाकर रोने लगती। किरन कभी बेटी को संभालती तो कभी नन्हे अंश को।

तीन दिन बीत गए, लेकिन नील के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई।

चौथे दिन गाँव से मीना के दादा-दादी अस्पताल पहुँचे। दादी को देखते ही मीना दौड़कर उनके पैरों में गिर पड़ी।

दादी ने उसे उठाना चाहा, लेकिन मीना रोते हुए बोली—

“दादी… मुझे भी वही आशीर्वाद दीजिए, जो आप हमेशा मम्मी को देती थीं।”

किरन की आँखों से आँसू बह निकले। दादी भी रो पड़ीं। उन्होंने काँपते हाथों से मीना के सिर पर हाथ रखा और कहा—

“सदा सुहागन रह मेरी बच्ची… सदा सुहागन रह।”

तभी अचानक नर्स दौड़ती हुई आई और बोली—

“मरीज के शरीर में हरकत हुई है!”

सभी की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।

मीना ने दादी को कसकर गले लगा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में खुशी थी।

उसने दादी से कहा—

“धन्यवाद दादी… आज समझ आया कि आपके उस आशीर्वाद में केवल शब्द नहीं, एक पत्नी के पूरे जीवन की खुशियों की दुआ छिपी होती है।”

और वह नील को देखने के लिए दौड़ पड़ी।

किसी परंपरा या आशीर्वाद को समझे बिना उसे पुराना या गलत मान लेना उचित नहीं। कई बार किसी छोटे-से वाक्य के पीछे वर्षों का प्रेम, चिंता और किसी अपने के सुखी जीवन की सच्ची कामना छिपी होती है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार       !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *