उत्तर प्रदेश के जिला राय बरेली के शिवगढ़ क्षेत्र के एक छोटे से गाँव हिंदू गंज में मोहन नाम का एक किसान रहता था। वह मेहनती तो बहुत था, लेकिन उसका स्वभाव थोड़ा क्रोधी था। छोटी-सी बात पर किसी से भी बहस करने लगता और कई बार बिना सोचे-समझे लोगों से झगड़ा कर बैठता था।
एक दिन मोहन अपने खेत की ओर जा रहा था। रास्ते में उसे उसका पड़ोसी रघुवीर मिल गया। रघुवीर ने हँसते हुए कहा, “मोहन, इस बार तो लगता है तुम्हारी फसल मेरी फसल से कम होगी।”
मोहन को यह बात बुरी लग गई। उसने तुरंत कहा, “तुम्हें मेरी फसल की इतनी चिंता क्यों है? अपने खेत को संभालो।”
बात बढ़ते-बढ़ते दोनों में बहस होने लगी। गाँव के कुछ लोग भी वहाँ जमा हो गए। तभी गाँव के बुजुर्ग हरिदास बाबा वहाँ पहुँचे। उन्होंने दोनों को शांत कराया और मोहन से बोले, “बेटा, किसी के साथ लड़कर क्या मिल जाएगा? जितना तुम्हारे नसीब में होगा, उतना ही तुम्हारे हाथ आएगा।”
मोहन ने कहा, “बाबा, अगर मैं चुप रहूँगा तो लोग मुझे कमजोर समझेंगे।”
बाबा मुस्कुराए और बोले, “चुप रहना कमजोरी नहीं, समझदारी है। मेहनत करने वाला व्यक्ति अपना समय विवाद में नहीं, अपने काम में लगाता है।”
मोहन ने बाबा की बात सुन तो ली, लेकिन उसके मन में पूरी तरह नहीं उतरी।
कुछ दिनों बाद गाँव में एक व्यापारी आया। उसने किसानों से उनकी फसल खरीदने की बात कही। व्यापारी ने दोनों की फसल देखी और उचित कीमत लगाई।
मोहन को लगा कि उसे रघुवीर से अधिक पैसे मिलेंगे, लेकिन व्यापारी ने दोनों की फसल की गुणवत्ता के अनुसार समान कीमत दी।
मोहन को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने व्यापारी से कहा, “मैंने तो इस बार बहुत मेहनत की थी।”
व्यापारी ने उत्तर दिया, “तुम्हारी मेहनत का पूरा मूल्य तुम्हें मिला है। न किसी की मेहनत छीन सकते हो और न अपने हिस्से से अधिक पा सकते हो।”
उस समय मोहन को हरिदास बाबा की बात याद आ गई—“जितना नसीब में होगा, उतना ही हाथ आएगा।”
वह समझ गया कि दूसरों से लड़कर वह अपने हिस्से की खुशी नहीं बढ़ा सकता। उल्टा, झगड़े में समय और रिश्ते दोनों खो जाते हैं।
उस दिन से मोहन ने अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया। अब कोई उसे उकसाता तो वह मुस्कुराकर कहता, “मैं अपना कर्म करूँगा, फल ऊपर वाले पर छोड़ दूँगा।”
कुछ समय बाद मोहन और रघुवीर के बीच भी मित्रता हो गई। दोनों एक-दूसरे की खेती में मदद करने लगे।
जीवन में हर चीज पाने के लिए लड़ना जरूरी नहीं होता। जो हमारे भाग्य और मेहनत में लिखा है, वह हमें मिलकर ही रहता है। इसलिए दूसरों से ईर्ष्या या विवाद करने के बजाय अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए। किसी के साथ लड़कर हमारी तकदीर नहीं बदलती, लेकिन शांति से किया गया अच्छा कर्म जीवन जरूर बदल सकता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
