” असली चरित्र “

एक छोटे से गाँव में रघुवीर नाम का एक मेहनती और सरल स्वभाव का व्यक्ति रहता था। वह स्वभाव से बहुत दयालु था। गाँव में कोई भी व्यक्ति परेशानी में होता, तो रघुवीर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी सहायता जरूर करता। किसी को धन की आवश्यकता होती तो वह पैसे देता, किसी को खेत में सहायता चाहिए होती तो अपना काम छोड़कर उसके साथ खड़ा हो जाता।

रघुवीर का सबसे करीबी मित्र था सुधीर। दोनों की मित्रता पूरे गाँव में प्रसिद्ध थी। सुधीर अक्सर रघुवीर से कहता, “तुम मेरे भाई जैसे हो। जीवन में कभी भी मुझे तुम्हारी आवश्यकता होगी, मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।”

रघुवीर इन बातों पर विश्वास करता था।

समय बीतता गया। एक दिन रघुवीर ने अपनी मेहनत से एक छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया। धीरे-धीरे उसका काम बढ़ने लगा और उसकी आर्थिक स्थिति पहले से अच्छी हो गई। अब गाँव के कई लोग उससे सलाह लेने लगे। सुधीर भी अक्सर रघुवीर के पास आता और किसी न किसी काम के लिए उसकी सहायता माँगता।

रघुवीर ने कभी उसे खाली हाथ नहीं लौटाया।

एक दिन रघुवीर के व्यवसाय में अचानक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। उसका काफी धन डूब गया। परिस्थितियाँ इतनी खराब हो गईं कि उसे अपने खर्चों में भी कटौती करनी पड़ी।

अब रघुवीर पहले की तरह किसी की आर्थिक सहायता करने की स्थिति में नहीं था।

कुछ दिनों बाद सुधीर उसके पास आया और बोला, “मुझे कुछ पैसों की बहुत आवश्यकता है। तुम मेरी सहायता कर दो।”

रघुवीर ने विनम्रता से कहा, “भाई, इस समय मैं स्वयं कठिन परिस्थिति में हूँ। अगर मेरे पास होते तो मैं तुम्हें जरूर देता।”

सुधीर का चेहरा अचानक बदल गया।

वह बोला, “जब तुम्हारे पास पैसा था, तब तो तुम बड़े भाई बनते थे। अब जरूरत के समय तुम्हारे पास कुछ नहीं है!”

रघुवीर चुप रहा।

इसके बाद सुधीर ने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी। जो व्यक्ति कभी रोज उसके घर आता था, अब रास्ते में मिलने पर भी नजरें फेर लेता था।

रघुवीर को बहुत दुख हुआ, लेकिन कुछ दिनों बाद उसे एक बड़ी बात समझ में आई।

सुधीर की मित्रता रघुवीर से नहीं, बल्कि रघुवीर की सामर्थ्य से थी।

कुछ महीनों बाद रघुवीर ने फिर मेहनत शुरू की। उसने धीरे-धीरे अपना व्यवसाय दोबारा खड़ा कर लिया। इस बार उसने एक बात हमेशा के लिए याद रखी—लोगों की बातें नहीं, उनका व्यवहार याद रखना चाहिए।

एक दिन गाँव के एक बुजुर्ग ने रघुवीर से कहा, “बेटा, बुरा मत मानना। कभी-कभी जीवन में विपत्ति इसलिए आती है ताकि हमें अपने आसपास के लोगों का वास्तविक रूप दिखाई दे सके।”

रघुवीर मुस्कुराया और बोला, “अब मुझे समझ आ गया है कि किसी व्यक्ति का असली चरित्र तब सामने आता है, जब आप उसके मतलब के नहीं रहते।”

उस दिन के बाद रघुवीर ने किसी से घृणा नहीं की। उसने बस इतना सीखा कि हर व्यक्ति पर आँख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए।

 

जब तक आप किसी के काम आते हैं, तब तक बहुत से लोग आपको अपना कहते हैं। लेकिन जब आप उनके किसी काम के नहीं रहते, तब उनके व्यवहार में आया परिवर्तन ही उनके वास्तविक चरित्र को सामने लाता है।

इसलिए किसी के बदल जाने पर स्वयं को दोष मत दीजिए। कुछ लोग आपके साथ इसलिए नहीं होते कि वे आपको चाहते हैं, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि उन्हें आपसे कुछ चाहिए होता है।

समय सबका असली चेहरा दिखा देता है।
इसलिए अच्छे बने रहिए, लेकिन समझदार भी बनिए।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार        !

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