” तभी तो… “

बहुत समय पहले की बात है। जब राज शाही हुआ करती थी ! उत्तर प्रदेश की धरती पर एक सुंदर और समृद्ध नगरी थी। वहाँ की प्रजा सुखी थी और अपने राजा का बहुत सम्मान करती थी। राजा न्यायप्रिय, विनम्र और प्रजा के दुख-दर्द को समझने वाला था।

एक दिन एक साधु बाबा उसी नगरी में विचरण करते हुए पहुँचे। नगर की खुशहाली देखकर उनके मन में राजा से मिलने की इच्छा हुई। उन्होंने लोगों से राजमहल का रास्ता पूछा और अपनी छोटी-सी गठरी लेकर महल की ओर चल पड़े।

रास्ते में कुछ सैनिकों ने उन्हें रोक लिया।

एक सैनिक ने कड़क आवाज में पूछा,
“कौन है बूढ़े? कहाँ जा रहा है? राजमहल की तरफ क्यों जा रहा है? कहीं किसी दुश्मन देश का जासूस तो नहीं? वापस चला जा, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा।”

साधु ने शांत भाव से केवल इतना कहा—
“तभी तो…”

सैनिकों को कुछ समझ नहीं आया। उन्होंने साधु की गठरी तलाशी और फिर उन्हें आगे जाने दिया।

कुछ देर बाद साधु राजमहल के मुख्य द्वार पर पहुँचे। वहाँ द्वारपाल ने उन्हें रोकते हुए कहा,
“बाबाजी, अगर दक्षिणा लेने आए हैं तो अगली पूर्णिमा को आना। उस दिन राजा गरीबों को दान देते हैं। आज यहाँ आपको कुछ नहीं मिलेगा।”

साधु ने फिर मुस्कुराकर कहा—
“तभी तो…”

द्वारपाल भी हैरान रह गया। उसे लगा कि साधु के शब्दों में कोई गहरा रहस्य है। उसने तुरंत मंत्री को इसकी सूचना दी।

मंत्री ने साधु को सम्मानपूर्वक अंदर बुलाया और कहा,
“महात्मा जी, आप कहाँ से पधारे हैं? कृपया अपना परिचय दीजिए और यहाँ आने का उद्देश्य बताइए। महाराज अभी भोजन करने जा रहे हैं, इसलिए शायद आपसे मिल न पाएँ।”

साधु ने फिर वही उत्तर दिया—
“तभी तो…”

मंत्री और अधिक उलझ गया। वह तुरंत राजा के पास पहुँचा और पूरी बात बता दी।

राजा ने जैसे ही सुना कि एक साधु महल में आए हैं, उन्होंने कहा,
“मेरे राज्य में एक संत आए हों और मैं भोजन कर लूँ, यह कैसे संभव है?”

राजा स्वयं साधु के पास गए। उन्होंने साधु का स्वागत किया, उनके चरण धोए, उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया और पहले उन्हें भोजन करवाया। साधु के भोजन करने के बाद राजा ने हाथ जोड़कर कहा—

“महात्मा जी, अब कृपया बताइए कि आप प्रत्येक व्यक्ति से केवल ‘तभी तो’ क्यों कह रहे थे?”

साधु मुस्कुराए और बोले—

“राजन, सबसे पहले आपके सैनिकों ने मुझे रोका। उनकी भाषा कठोर और व्यवहार अभद्र था। मैंने कहा ‘तभी तो’, क्योंकि जिस व्यक्ति की भाषा और व्यवहार ऐसा होगा, वह छोटे पद पर ही रहेगा।

फिर द्वारपाल मिला। उसकी भाषा सैनिकों से बेहतर थी, लेकिन उसे अतिथि और साधु का सम्मान करना नहीं आता था। इसलिए मैंने कहा—‘तभी तो’, उसका पद भी उसी व्यवहार के अनुरूप है।

फिर आपके मंत्री मिले। उनकी भाषा शालीन थी और वे सम्मान करना जानते थे, लेकिन उन्होंने अतिथि के स्वागत से पहले आपके भोजन की चिंता की। इसलिए मैंने कहा—‘तभी तो’, उनकी सोच और व्यवहार उन्हें मंत्री के पद तक लाए हैं।

और फिर मैं आपसे मिला। आपने अपना भोजन छोड़ दिया, अतिथि का सम्मान किया, पहले मुझे भोजन करवाया और जिस विनम्रता से मेरा स्वागत किया, वह सबसे श्रेष्ठ था।

इसलिए मैंने आपसे भी कहा—‘तभी तो’ आप राजा हैं।”

राजा कुछ क्षण मौन रहे। साधु ने अंत में कहा—

“राजन, मनुष्य का पद केवल उसके वस्त्र, धन या कुर्सी से नहीं पहचाना जाता। उसकी भाषा, व्यवहार, विनम्रता और दूसरों के प्रति सम्मान ही बताते हैं कि वह वास्तव में कितना बड़ा है।”

राजा ने साधु को प्रणाम किया और उस दिन से अपने दरबार में एक नियम बना दिया—
“पद बड़ा हो या छोटा, इंसान की पहचान उसके व्यवहार से होगी।”

 

इंसान की असली ऊँचाई उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और भाषा की मिठास से होती है।
क्योंकि जिसका व्यवहार जितना श्रेष्ठ होता है, उसका व्यक्तित्व उतना ही ऊँचा होता है।

“बोल ऐसे बोलिए, जो दिल में उतर जाएँ;
क्योंकि शब्द ही बताते हैं कि इंसान कितना बड़ा है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार      !

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