कुछ दिनों पहले लखनऊ से मुंबई की उड़ान में एक बुज़ुर्ग सरदारजी और उनकी पत्नी से मुलाकात हुई। सरदारजी की उम्र लगभग अस्सी वर्ष रही होगी और सरदारनी भी पचहत्तर के आसपास थीं। उम्र ने शरीर पर अपना असर जरूर छोड़ा था, मगर दोनों के चेहरे पर संतोष और जीवन जीने की चमक साफ दिखाई दे रही थी।
उड़ान भरने के कुछ देर बाद सरदारनी ने घर से लाया हुआ थोड़ा-सा खाना निकालकर पति को दिया। सरदारजी के हाथ कांप रहे थे, फिर भी उन्होंने धीरे-धीरे अपना खाना खुद खाया।
कुछ देर बाद दोनों ने राजमा-चावल मंगवाए। वे बड़े आराम से खाना खाते रहे। खाना खत्म होने के बाद सरदारजी ने जूस की बोतल उठाई और उसका ढक्कन खोलने लगे। उम्र के कारण हाथों में कंपन था और ढक्कन बार-बार घूमकर भी नहीं खुल रहा था।
मैंने शिष्टाचारवश कहा,
“लाइए सरदारजी, मैं खोल देता हूं।”
उन्होंने मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा और बोले,
“बेटा, आज तो तुम खोल दोगे… लेकिन अगली बार कौन खोलेगा?”
मैं उनकी बात सुनकर चुप हो गया।
उन्होंने फिर कहा,
“इसीलिए जब तक हाथ-पैर साथ दे रहे हैं, अपना काम खुद करना सीखना चाहिए।”
कई कोशिशों के बाद आखिर उन्होंने खुद ही बोतल खोल ली। जूस का एक घूंट पीकर वे मुस्कुराए, जैसे उन्होंने केवल बोतल का ढक्कन नहीं, बल्कि जिंदगी की एक चुनौती खोल दी हो।
बातों-बातों में उन्होंने बताया कि उनके बच्चे और बहुएं साथ ही रहते हैं। परिवार भरा-पूरा है और सभी उनकी मदद के लिए तैयार रहते हैं, लेकिन उन्होंने एक नियम बना रखा है—जहां तक संभव हो, अपना काम खुद करेंगे।
उन्होंने कहा,
“बेटा, अगर आज हर छोटे काम के लिए दूसरों को बुलाने लगूं, तो धीरे-धीरे मेरा शरीर भी काम करना छोड़ देगा और मन भी। फिर आदत पड़ जाएगी कि यह काम कोई और कर दे, वह काम कोई और कर दे। एक दिन ऐसा आएगा कि चलने के लिए भी सहारे की जरूरत पड़ेगी।”
उनकी बातों में जीवन का गहरा अनुभव था।
उन्होंने बताया कि दोनों महीने में एक-दो बार घूमने निकल जाते हैं। इस बार वह मुंबई और मुंबई से गोवा जा रहे थे। बच्चे कहते हैं कि इस उम्र में अकेले घूमना मुश्किल होगा, लेकिन उनका जवाब बड़ा सरल था—
“मुश्किल घूमने में नहीं है बेटा, मुश्किल तो तब होगी जब हम जीना ही छोड़ देंगे।”
उन्होंने जिंदगी भर मेहनत की, बच्चों को अपने पैरों पर खड़ा किया और अब अपने लिए भी थोड़ा समय निकालते हैं। टिकट एजेंट से बुक करवाते हैं, टैक्सी घर से लेने आती है और होटल में आराम से रहते हैं।
मैं उनकी बातें सुनता रहा और सोचता रहा कि हम अक्सर उम्र को जीवन का अंत समझ लेते हैं, जबकि असली अंत तब होता है जब इंसान अपने भीतर से जीने की इच्छा खो देता है।
उस दिन मैंने लैपटॉप पर फिल्म देखने का सोचा था, लेकिन उस उड़ान में मुझे उससे कहीं बड़ी फिल्म दिखाई दी—एक ऐसी फिल्म, जिसमें जीवन जीने का सच्चा अर्थ छिपा था।
उस बुज़ुर्ग सरदारजी ने मुझे सिखाया कि बच्चों का सहारा होना अच्छी बात है, लेकिन हर छोटी जरूरत के लिए उन पर निर्भर हो जाना अच्छी बात नहीं।
जब तक शरीर साथ दे, अपना काम स्वयं करें।
जब तक कदम चलें, अपने रास्ते खुद चुनें।
और जब तक सांसों में हिम्मत हो, जिंदगी को घर की चारदीवारी में कैद न करें।
क्योंकि जिंदगी उम्र से नहीं, हौसले से जवान रहती है।
और कभी कोई जूस की बोतल न खुले, तो हार मत मानिए…
थोड़ा और प्रयास कीजिए।
हो सकता है ढक्कन के साथ-साथ जिंदगी का कोई बंद दरवाजा भी खुल जाए।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
