” दीपक से जीवन बदल गया “

सतयुग की बात है। हिमालय की तलहटी में स्थित एक सुंदर आश्रम में अनेक ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। उसी आश्रम के पास ऋषि अत्रेय का आश्रम था। उनके दो शिष्य थे—सुमेध और मंदार।

दोनों ने वर्षों तक साथ रहकर वेद, शास्त्र और धनुर्वेद का अध्ययन किया। शिक्षा पूरी होने के बाद दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ गए। सुमेध ने गुरु के उपदेशों का पालन किया। परिश्रम, अनुशासन और सेवा के बल पर वह एक प्रसिद्ध ऋषि बन गया। उसके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

दूसरी ओर मंदार आलस्य का शिकार हो गया। उसने साधना छोड़ दी। उसका आश्रम उजड़ने लगा। चारों ओर सूखे पत्ते, धूल और मकड़ी के जाले छा गए। यज्ञशाला वीरान पड़ी रहती थी। उसके मन में भी निराशा और उदासी घर कर गई थी।

एक दिन सुमेध अपने पुराने मित्र से मिलने पहुँचा। उसने देखा कि आश्रम की दुर्दशा देखकर पक्षी भी वहाँ बैठना पसंद नहीं करते। मंदार ने एक टूटी-सी आसंदी पर बैठने का आग्रह किया, जिस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।

सुमेध ने मुस्कुराकर कहा, “मित्र! यह आश्रम तो तप और पवित्रता का स्थान होता है। इसे इतना उपेक्षित क्यों छोड़ रखा है?”

मंदार बोला, “क्या लाभ? आज साफ करूँगा तो कुछ दिनों बाद फिर गंदा हो जाएगा।”

सुमेध ने उसे बहुत समझाया, लेकिन उसका मन नहीं बदला। विदा होते समय उसने अपने कमंडल से एक दिव्य घृत दीपक निकाला और कहा, “इसे प्रतिदिन संध्या के समय जला देना। बस इतना ही करना।”

मंदार ने बिना रुचि के दीपक को यज्ञशाला के कोने में रख दिया। उस संध्या जब उसने दीपक जलाया, तो उसकी स्वर्णिम ज्योति पूरे कक्ष में फैल गई। तभी उसे लगा कि दीपक के चारों ओर धूल और जाले अच्छे नहीं लग रहे।

अगले दिन उसने केवल दीपक के आसपास की जगह साफ कर दी। कुछ दिनों बाद आश्रम में आने वाले साधु कहने लगे, “दीपक की ज्योति तो दिव्य है, पर बाकी आश्रम इसकी शोभा के योग्य नहीं।”

यह बात मंदार के हृदय को छू गई। उसने धीरे-धीरे पूरी यज्ञशाला साफ की। फिर आँगन से सूखे पत्ते हटाए, पौधे लगाए और आश्रम की मरम्मत करवाई। कुछ ही समय में उसका आश्रम फिर से तपोभूमि बन गया।

आश्रम के बदलने के साथ-साथ मंदार का मन भी बदल गया। उसने नियमित जप, तप और स्वाध्याय आरंभ कर दिया। उसकी कीर्ति भी चारों दिशाओं में फैलने लगी। एक दिन वह अपने गुरु के चरणों में पहुँचा और बोला, “गुरुदेव! मेरा जीवन एक छोटे से दीपक ने बदल दिया।”

गुरु मुस्कुराए और बोले, “वत्स! परिवर्तन कभी बड़ा नहीं होता, वह एक छोटे से शुभ संकल्प से प्रारंभ होता है। जो व्यक्ति एक अच्छी आदत को दृढ़ता से अपनाता है, उसका जीवन स्वयं प्रकाशमय हो जाता है।”

 

जीवन में परिवर्तन किसी बड़े चमत्कार से नहीं, बल्कि एक छोटी-सी अच्छी आदत से शुरू होता है। जैसे एक दीपक अंधकार मिटा देता है, वैसे ही एक अच्छा संस्कार पूरे जीवन को प्रकाशित कर सकता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

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