” खुशियों को कल पर नहीं टालना चाहिए “

उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव गंगा गंज में बबलू और उसकी पत्नी प्रमिला अपने दो बच्चों के साथ एक सादा लेकिन खुशहाल जीवन जीते थे। बबलू मेहनती किसान था। सुबह सूरज निकलने से पहले खेतों में चला जाता और देर शाम थका-हारा घर लौटता। प्रमिला पूरे घर की जिम्मेदारी संभालती। उसने कभी अपने लिए कोई बड़ी मांग नहीं की। न सोने के गहने, न महंगी साड़ी और न ही किसी बड़े शहर में घूमने की जिद।

लेकिन उसकी एक छोटी-सी इच्छा थी।

वह अक्सर मुस्कुराकर कहती, “सुनो जी, एक दिन हम दोनों कहीं दूर चलेंगे। बस दो दिन… बिना बच्चों के, बिना किसी चिंता के।”

बबलू हर बार हँसकर कहता, “अरे प्रमिला, अभी फसल का काम है। अगले साल पक्का चलेंगे।”

अगला साल आता, लेकिन कोई न कोई बहाना तैयार रहता। कभी खेती, कभी पैसों की कमी, तो कभी बच्चों की पढ़ाई। देखते-देखते ग्यारह साल बीत गए और प्रमिला हर साल वही सपना अपनी आँखों में सजाए रहती।

एक दिन घर की पुरानी अलमारी साफ करते समय बबलू को प्रमिला की एक डायरी मिली। जिज्ञासा से उसने उसे खोलकर पढ़ना शुरू किया।

पहले पन्ने पर लिखा था—

“आज फिर उन्होंने कहा, अगले साल चलेंगे। शायद इस बार सच हो जाए।”

दूसरे पन्ने पर लिखा था—

“मुझे किसी महंगी जगह नहीं जाना। मुझे बस उनके साथ दो दिन अकेले बिताने हैं।”

फिर एक पन्ना आया जो आठ साल पुराना था।

“अब घूमने की इच्छा नहीं रही। बस कभी ऐसा हो कि वे बिना किसी काम की चिंता के मेरे साथ बैठकर बातें करें।”

डायरी पढ़ते-पढ़ते बबलू की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पहली बार एहसास हुआ कि प्रमिला को पहाड़, शहर या होटल नहीं चाहिए थे। उसे तो सिर्फ अपने पति का थोड़ा-सा समय चाहिए था।

उसी शाम बबलू पास के शहर गया और दो दिन की यात्रा के टिकट बुक करा लाया। घर आकर उसने मुस्कुराते हुए टिकट प्रमिला के हाथ में रख दिए।

प्रमिला ने टिकट देखे। उसकी आँखों में हल्की चमक आई, लेकिन अगले ही पल वह फीकी मुस्कान के साथ बोली, “अब मन नहीं करता।”

बबलू घबरा गया।

“क्यों प्रमिला? यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी इच्छा थी।”

प्रमिला ने शांत स्वर में कहा, “इच्छाएँ भी इंसानों जैसी होती हैं। अगर उन्हें बहुत लंबे समय तक इंतज़ार करवाओ, तो वे भी धीरे-धीरे मर जाती हैं।”

यह सुनकर बबलू का सिर शर्म से झुक गया। उसे समझ आ गया कि उसने काम और जिम्मेदारियों के पीछे भागते-भागते अपनी पत्नी की सबसे प्यारी इच्छा को ही अनदेखा कर दिया।

उस दिन के बाद बबलू ने एक संकल्प लिया कि अब वह अपने परिवार के लिए समय ज़रूर निकालेगा। उसने सीखा कि जीवन में धन, खेती और काम फिर भी पूरे हो सकते हैं, लेकिन अपनों के साथ बिताने वाला समय एक बार निकल जाए तो कभी लौटकर नहीं आता।

रिश्ते बड़े झगड़ों से नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों के बार-बार टल जाने से कमजोर पड़ जाते हैं। इसलिए अपनों की सच्ची इच्छाओं को “कल” पर मत टालिए, क्योंकि कई बार वह “कल” बहुत देर से आता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार     !

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