सर्दियों की हल्की धूप पूरे विद्यालय परिसर में फैली हुई थी। सुबह की प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी और सभी बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं में पढ़ाई कर रहे थे। तभी स्कूल के मुख्य द्वार पर लाल बत्ती वाली सरकारी गाड़ी आकर रुकी। सुरक्षा कर्मियों को देखकर पूरे विद्यालय में हलचल मच गई। खबर फैल गई कि जिले के कलेक्टर निरीक्षण के लिए आए हैं।
प्रधानाचार्या विमला कस्वां घबराकर कार्यालय से बाहर आईं। सभी शिक्षक अपनी-अपनी कक्षाओं में पूरी गंभीरता से पढ़ाने लगे। कार्यालय के बाहर बैठी लगभग साठ वर्ष की चपरासी सरिता देवी भी जल्दी-जल्दी अपना नकली पैर पहनने लगीं। एक दुर्घटना में उन्होंने वर्षों पहले अपना एक पैर खो दिया था। बैसाखी के सहारे वह रोज़ स्कूल की सेवा करती थीं।
लेकिन कलेक्टर साहब सीधे प्रधानाचार्या के पास न जाकर सरिता देवी की ओर बढ़ने लगे। सरिता देवी घबरा गईं। वह बिना नकली पैर पहने ही बैसाखी के सहारे खड़ी हो गईं।
अचानक कलेक्टर साहब उनके सामने घुटनों के बल बैठ गए।
“अम्मा… पहचाना मुझे?”
सरिता देवी ने कांपते हाथों से अपना चश्मा ठीक किया। कुछ क्षण तक चेहरे को ध्यान से देखा, फिर उनकी आंखें भर आईं।
“नंदू…!”
बस इतना कहना था कि कलेक्टर साहब उनकी गोद में सिर रखकर बच्चे की तरह रो पड़े।
पूरा स्कूल यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया।
कुछ देर बाद कलेक्टर साहब ने स्वयं झुककर सरिता देवी का नकली पैर पहनाया और मुस्कुराते हुए बोले—
“अम्मा, आपने कहा था कि मेहनत करोगे तो एक दिन बड़ा अधिकारी बनोगे। देखिए, आज आपका नंदू कलेक्टर बन गया।”
प्रधानाचार्या आश्चर्य से सब सुन रही थीं। उन्होंने पूछा, “सर, क्या ये आपकी माँ हैं?”
कलेक्टर मुस्कुराए और बोले—
“रिश्ते केवल खून से नहीं, त्याग और प्रेम से बनते हैं।”
फिर उन्होंने सबको अपनी कहानी सुनाई।
“मैं बहुत गरीब परिवार से था। पिता का देहांत जल्दी हो गया था। कई दिन ऐसे गुजरते थे जब भूखे पेट स्कूल आता था। पढ़ाई छोड़ने की नौबत आ गई थी। उसी समय इस स्कूल में सरिता अम्मा चपरासी थीं। इन्होंने मेरी फीस भरी, पुरानी किताबें दिलाईं, अपने हिस्से का खाना मुझे खिलाया और हर दिन कहा—’बेटा, गरीबी भाग्य नहीं, मेहनत से बदली जा सकती है।'”
उन्होंने आगे कहा—
“जब दुर्घटना में अम्मा का पैर चला गया, तब भी इन्होंने कभी हार नहीं मानी। हमेशा मुस्कुराकर दूसरों का हौसला बढ़ाती रहीं। आज मैं जो भी हूँ, इनकी ममता और त्याग की वजह से हूँ।”
पूरा विद्यालय तालियों से गूंज उठा। कई शिक्षकों की आंखें नम हो गईं।
कलेक्टर साहब ने सबके सामने घोषणा की—
“आज से अम्मा नौकरी नहीं करेंगी। उनकी सेवा और सम्मान की जिम्मेदारी मेरी है। अब वे मेरे घर चलेंगी। जिस माँ ने मुझे सहारा दिया, अब उनका सहारा बनना मेरा धर्म है।”
सरिता देवी की आंखों से खुशी के आँसू लगातार बह रहे थे। उन्होंने आकाश की ओर देखा और मन ही मन भगवान का धन्यवाद किया। उन्हें अपनी निःसंतान होने का दुःख आज पहली बार नहीं, बल्कि हमेशा के लिए समाप्त होता हुआ महसूस हुआ।
उस दिन पूरे विद्यालय ने एक अनमोल सीख सीखी—दया से दिया गया छोटा-सा सहारा किसी का पूरा जीवन बदल सकता है।
सच्चा रिश्ता जन्म से नहीं, प्रेम, त्याग और निस्वार्थ सेवा से बनता है। जो दूसरों के भविष्य को संवारता है, ईश्वर उसके बुढ़ापे का सहारा किसी न किसी रूप में अवश्य भेजता है !
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
