” उद्देश्य की पवित्रता “

प्राचीन समय की बात है। हिमालय की तलहटी में स्थित एक छोटे से राज्य पर राजा धर्मकेतु का शासन था। वे न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। उनके राज्य में सत्य और धर्म का बड़ा सम्मान था। उसी राज्य में माधव नाम का एक युवक रहता था। वह गरीब था, लेकिन उसका हृदय करुणा और सेवा भाव से भरा हुआ था।

एक दिन माधव जंगल से होकर अपने गांव लौट रहा था। तभी उसने देखा कि कुछ डाकू एक वृद्ध साधु को घेरकर उनका धन छीनने का प्रयास कर रहे हैं। साधु असहाय थे और सहायता के लिए पुकार रहे थे। माधव जानता था कि वे डाकू बहुत शक्तिशाली हैं और अकेले उनका सामना करना उसके लिए आसान नहीं होगा। फिर भी उसके मन में एक ही विचार आया—”यदि मैं आज इनकी सहायता नहीं करूंगा, तो मेरा जीवन व्यर्थ है।”

उसने साहस जुटाया और डाकुओं के सामने खड़ा हो गया। माधव ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं माने। अंततः संघर्ष शुरू हो गया। डाकुओं ने माधव को बुरी तरह घायल कर दिया। उसके शरीर पर अनेक घाव हो गए और वह बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ा। डाकू साधु का धन लेकर भाग गए।

कुछ समय बाद गांव वाले वहां पहुंचे और माधव को घायल अवस्था में देखकर उसे घर ले गए। कई दिनों तक उसका उपचार चलता रहा। लोगों ने कहा, “तुम्हें क्या मिला उस साधु की रक्षा करने से? न साधु का धन बचा और न ही तुम जीत सके।”

माधव मुस्कुराया और बोला, “मैं परिणाम के लिए नहीं, अपने कर्तव्य के लिए खड़ा हुआ था। यदि मैं डरकर पीछे हट जाता, तो जीवनभर स्वयं की नजरों में गिर जाता।”

यह बात धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गई। जब राजा धर्मकेतु को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने माधव को राजसभा में बुलाया। राजा ने कहा, “पुत्र! लोग तुम्हें असफल समझ रहे हैं, क्योंकि तुम डाकुओं को रोक नहीं सके। लेकिन मेरी दृष्टि में तुम विजेता हो। विजय केवल परिणाम से नहीं मापी जाती, बल्कि उस उद्देश्य से मापी जाती है जिसके लिए कर्म किया जाता है।”

राजा ने माधव को सम्मानित किया और राज्य की सुरक्षा सेना में महत्वपूर्ण पद दिया। उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों से कहा, “यदि किसी का उद्देश्य स्वार्थ, अहंकार या लालच हो, तो उसका सफल होना भी महान नहीं कहलाता। लेकिन यदि किसी का उद्देश्य धर्म, करुणा और परोपकार हो, तो उसका प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, चाहे परिणाम कुछ भी हो।”

उस दिन सभी को एक गहरी शिक्षा मिली। माधव ने भी समझ लिया कि सच्ची सफलता बाहरी जीत में नहीं, बल्कि अपने मन की पवित्रता में छिपी होती है।

 

कर्म की महानता उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे उद्देश्य की पवित्रता से तय होती है। पवित्र उद्देश्य से किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं जाता, क्योंकि वह व्यक्ति के चरित्र और आत्मा को महान बना देता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार     !

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