बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य में रघुवीर सिंह नाम का राजा राज करता था। वह बहुत बुद्धिमान था, लेकिन उसे अपने खजाने पर बड़ा गर्व था। उसने वर्षों की मेहनत से अपार धन-संपत्ति इकट्ठा की थी। महल के एक विशेष कक्ष में उसने सोना, चांदी, हीरे और बहुमूल्य रत्न रखे थे। वह रोज़ उस खजाने को देखने जाता और सोचता कि यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
एक दिन राज्य में एक वृद्ध संत आए। राजा ने उनका बड़ा सम्मान किया। बातचीत के दौरान संत ने राजा से पूछा, “राजन, तुम्हारी सबसे बड़ी संपत्ति क्या है?”
राजा तुरंत बोला, “मेरा खजाना। मेरे पास इतना धन है कि कई पीढ़ियाँ आराम से जी सकती हैं।”
संत मुस्कुराए और बोले, “क्या सचमुच यह तुम्हारी संपत्ति है, या तुम स्वयं इसके कैदी बन चुके हो?”
राजा को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने कहा, “मैं इस राज्य का स्वामी हूँ, किसी का कैदी नहीं।”
संत ने कुछ नहीं कहा और अगले दिन राजा को जंगल में मिलने का निमंत्रण दिया।
अगले दिन राजा अपने सैनिकों के साथ जंगल पहुँचा। वहाँ संत एक पुराने पेड़ के नीचे बैठे थे। उन्होंने राजा को एक मोटी रस्सी दी और कहा, “इसे पकड़ लो।”
राजा ने रस्सी पकड़ ली।
संत बोले, “अब इसे छोड़ दो।”
राजा ने तुरंत रस्सी छोड़ दी।
संत ने पूछा, “क्या रस्सी ने तुम्हें पकड़ रखा था?”
राजा बोला, “नहीं, मैं स्वयं उसे पकड़े हुए था।”
संत मुस्कुराए और बोले, “यही बात तुम्हारे धन, अहंकार और मोह पर भी लागू होती है। जिन चीज़ों को तुम अपनी ताकत समझते हो, वास्तव में तुम स्वयं उन्हें पकड़े हुए हो।”
राजा कुछ सोच में पड़ गया।
संत उसे जंगल के अंदर एक छोटी झोपड़ी में ले गए। वहाँ एक बूढ़ा किसान रहता था। उसके पास न धन था, न बड़ी जमीन, फिर भी उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी।
राजा ने पूछा, “तुम इतने प्रसन्न कैसे रहते हो?”
किसान बोला, “महाराज, मेरे पास जो है, उसी में संतोष है। मैं उन चीज़ों का बोझ नहीं उठाता जो मेरे पास नहीं हैं।”
उस रात राजा को नींद नहीं आई। उसे एहसास हुआ कि वर्षों से वह अपने खजाने की रक्षा में इतना व्यस्त था कि उसने जीवन का आनंद लेना ही छोड़ दिया था। उसे हर समय चोरी, नुकसान और भविष्य की चिंता सताती रहती थी।
अगली सुबह राजा ने संत से कहा, “अब मैं समझ गया हूँ। मेरा खजाना मेरा सेवक नहीं, बल्कि मैं उसका सेवक बन गया था।”
संत ने कहा, “जिस दिन मनुष्य अपने भय, लालच और मोह को छोड़ देता है, उसी दिन वह वास्तव में स्वतंत्र हो जाता है।”
उस दिन के बाद राजा ने अपना जीवन बदल दिया। उसने धन का उपयोग प्रजा के कल्याण में करना शुरू किया, जरूरतमंदों की सहायता की और अपने मन को संतोष से भर लिया। अब उसके चेहरे पर भी वही शांति दिखाई देने लगी जो उस किसान के चेहरे पर थी।
जीवन में सबसे बड़ा बंधन लोहे की जंजीर नहीं, बल्कि मन का मोह होता है। जब तक हम डर, लालच, अहंकार और झूठी आसक्तियों को पकड़े रहते हैं, तब तक सच्ची खुशी और सफलता नहीं मिलती। जो छोड़ना सीख जाता है, वही जीवन में आगे बढ़ पाता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
