” किसान और कुआँ “

एक गाँव में एक परिश्रमी किसान रहता था।उसके खेत में पानी की भारी कमी थी, जिससे उसकी फसल बार-बार खराब हो जाती थी. एक दिन उसने ठान लिया कि अब वह अपने खेत में कुआँ खुदवाकर ही रहेगा, ताकि इस समस्या से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सके।

वह एक मजदूर के पास गया और कुआँ खुदवाने का काम शुरू करवाया. मजदूर ने कुछ दिन मेहनत की, लेकिन थोड़ी खुदाई के बाद ही काम अधूरा छोड़कर चला गया।

किसान चिंतित हो उठा. उसने दूसरे मजदूर को बुलाया, लेकिन इस बार उसने सोचा, “नए मजदूर को आधा खुदा हुआ कुआँ क्यों दूँ? उसे तो उतने ही पैसे मिलने हैं, इसलिए बेहतर है कि वह नए सिरे से खुदाई शुरू करे।”

इसी सोच के कारण हर बार नया गड्ढा शुरू होता, थोड़ी खुदाई होती और फिर काम अधूरा छूट जाता. कुछ ही समय में खेत में कई अधूरे गड्ढे बन गए, लेकिन एक भी कुआँ तैयार नहीं हुआ।

आखिरकार किसान थक-हारकर बैठ गया और सोचने लगा कि आखिर उससे कहाँ गलती हो रही है. तभी वहाँ से गुजर रहे एक बुजुर्ग ने उसे उदास देखा और उसके पास आकर उसकी परेशानी का कारण पूछा।

किसान ने अपनी पूरी व्यथा उन्हें सुनाई. बुजुर्ग मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “तुम हर बार नई शुरुआत कर देते हो, लेकिन किसी एक काम को पूरा करने का धैर्य नहीं रखते. यदि तुम एक ही जगह पर लगातार मेहनत करते, तो अब तक पानी निकल चुका होता।

यह बात किसान के दिल को छू गई. उसे अपनी गलती का एहसास हो गया. उसने उसी क्षण निश्चय किया कि अब वह किसी पर निर्भर नहीं रहेगा और एक ही स्थान पर पूरी लगन से मेहनत करेगा।

अगले ही दिन से उसने खुद कुआँ खोदना शुरू कर दिया. वह बिना रुके, बिना हारे लगातार मेहनत करता रहा. कुछ ही दिनों में उसकी मेहनत रंग लाई और आखिरकार उसे पानी मिल गया।

अब उसका खेत हरा-भरा हो गया और उसकी जिंदगी खुशियों से भर गई।

मित्रों! बार-बार नई शुरुआत करने से नहीं, बल्कि एक ही कार्य को निरंतरता और धैर्य के साथ पूरा करने से सफलता मिलती है. दूसरों पर अधिक निर्भरता और अधूरी सोच हमें लक्ष्य से दूर कर देती है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार    !

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