” सबका मंगल हो “


सतयुग की बात है। देवलोक में एक युवा देवकुमार रहता था, जिसका नाम सुमंगल था। वह अत्यंत प्रतिभाशाली था, परंतु उसमें एक दोष था—वह हर शुभ कार्य को टाल देता था। देवगुरु बृहस्पति उसे बार-बार समझाते थे कि आलस्य और टालमटोल देवत्व के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं, लेकिन सुमंगल उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेता था।

एक दिन देवलोक की सभा में भगवान श्रीहरि विष्णु विराजमान थे। सभी देवता उपस्थित थे। तभी भगवान विष्णु ने कहा—

“जो व्यक्ति किसी बुरी आदत, मोह या अहंकार को तुरंत त्यागने की शक्ति नहीं रखता, वह जीवन में कोई बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।”

यह वचन सुनकर सुमंगल का हृदय कांप उठा। उसने उसी क्षण प्रण किया कि वह आलस्य का त्याग करेगा और लोककल्याण के कार्यों में स्वयं को समर्पित करेगा।

कुछ समय बाद पृथ्वी लोक में भयंकर सूखा पड़ गया। नदियाँ सूखने लगीं, वृक्ष मुरझाने लगे और जीव-जंतु प्यास से व्याकुल हो उठे। पृथ्वी माता ने भगवान शिव और भगवान विष्णु से प्रार्थना की।

तब भगवान शिव ने सुमंगल को बुलाकर कहा—

“वत्स, यह समय सेवा का है। यदि तुम सचमुच अपने दोषों का त्याग कर चुके हो, तो पृथ्वी के कल्याण के लिए आगे बढ़ो।”

सुमंगल ने विनम्रता से प्रणाम किया और तुरंत पृथ्वी लोक की ओर प्रस्थान किया।

वहाँ पहुँचकर उसने देखा कि लोग जल का दुरुपयोग कर रहे थे और वृक्षों की कटाई लगातार बढ़ रही थी। उसने सबसे पहले ऋषियों और ग्रामवासियों को एकत्र किया और कहा—

“जल ही जीवन है। यदि हम प्रकृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो प्रकृति भी हमारा साथ छोड़ देगी।”

उसने लोगों को वर्षा जल संग्रह करना सिखाया और हजारों वृक्ष लगाने का संकल्प दिलाया। स्वयं भी वह प्रतिदिन पौधे लगाता और लोगों को प्रेरित करता।

सुमंगल की निष्ठा देखकर देवराज इंद्र प्रसन्न हुए। उन्होंने घनघोर वर्षा की और सूखी धरती फिर से हरी-भरी हो गई। नदियाँ कल-कल बहने लगीं और खेतों में हरियाली लौट आई।

लेकिन सफलता के साथ सुमंगल के मन में थोड़ा अहंकार आने लगा। उसे लगने लगा कि यह सब उसके प्रयासों का परिणाम है।

तभी एक दिन देवगुरु बृहस्पति प्रकट हुए और बोले—

“वत्स, याद रखो, सेवा का फल अहंकार नहीं, विनम्रता है।”

सुमंगल को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने तुरंत देवगुरु के चरणों में सिर झुका दिया और कहा—

“गुरुदेव, सबसे क्षमा, सबको क्षमा।”

उसकी विनम्रता देखकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और बोले—

“हे सुमंगल! जिसने अपने दोषों पर विजय पा ली, वही सच्चा देव है।”

तब से सुमंगल देवलोक और पृथ्वी लोक में लोककल्याण का प्रतीक बन गया। जहाँ भी वह जाता, लोगों को यही संदेश देता—

“राष्ट्र, धर्म, प्रकृति और संस्कृति की रक्षा करो। जल बचाओ, वृक्ष लगाओ और अपने भीतर की बुराइयों का तुरंत त्याग करो।”

कहते हैं कि उसी दिन से देवताओं के आशीर्वाद से पृथ्वी पर यह मंगलमय वचन गूंजने लगा—

“मंगल हो… मंगल हो… सबका मंगल हो।”

बुरी आदतों का त्याग, प्रकृति की रक्षा, विनम्रता और लोककल्याण का भाव ही मनुष्य को देवतुल्य बनाता है   !

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार   !

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