सतयुग की बात है। हिमालय की तलहटी में एक दिव्य वन था, जिसे देववन कहा जाता था। उस वन में अनेक वृक्ष, पशु-पक्षी और ऋषि-मुनि निवास करते थे। उसी वन के मध्य एक विशाल देवदारु वृक्ष खड़ा था। वह अपनी ऊँचाई और घनेपन पर बहुत गर्व करता था। उसके पास ही एक कल्पतरु वृक्ष था, जो अत्यंत विनम्र और परोपकारी था।
एक दिन स्वर्गलोक से कुछ गंधर्व-मधुमक्खियाँ पृथ्वी पर आईं। वे भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित होने वाले दिव्य मधु का निर्माण करती थीं। उन्हें अपने छत्ते के लिए एक सुरक्षित स्थान चाहिए था।
उनकी रानी ने देवदारु वृक्ष से विनम्रतापूर्वक कहा—
“हे वनश्रेष्ठ! क्या हम आपकी किसी शाखा पर अपना छत्ता बना सकते हैं?”
देवदारु अपने अहंकार में बोला—
“नहीं! मुझे किसी का भार उठाना पसंद नहीं। कहीं और जाओ।”
यह सुनकर पास खड़े कल्पतरु ने कहा—
“हे देवदारु! इनकी सहायता कर दो। दूसरों के काम आना ही सच्ची महानता है।”
देवदारु हँस पड़ा—
“यदि तुम्हें इतनी ही दया आ रही है, तो अपने ऊपर ही इनका छत्ता बनवा लो।”
कल्पतरु मुस्कुराया और मधुमक्खियों से बोला—
“आप सब मेरी शाखाओं पर निवास कर सकती हैं।”
मधुमक्खियों ने आभार व्यक्त किया और वहीं अपना सुंदर छत्ता बना लिया।
समय बीतता गया।
एक दिन कुछ असुर उस वन में पहुँचे। वे यज्ञों को नष्ट करने और ऋषियों को कष्ट देने के लिए लकड़ियाँ एकत्र कर रहे थे। उनकी दृष्टि कल्पतरु पर पड़ी।
एक असुर बोला—
“यह वृक्ष बहुत विशाल है। इसे काटकर हम बहुत लकड़ी प्राप्त कर सकते हैं।”
वे कुल्हाड़ियाँ लेकर आगे बढ़े, लेकिन तभी एक असुर की नज़र मधुमक्खियों के विशाल छत्ते पर पड़ी।
वह घबराकर बोला—
“नहीं! इस वृक्ष को मत काटो। यदि ये दिव्य मधुमक्खियाँ क्रोधित हो गईं तो हमारा बचना कठिन होगा।”
तब दूसरे असुर ने कहा—
“तो उस देवदारु को काट लेते हैं। वहाँ कोई खतरा भी नहीं है।”
सभी असुर देवदारु को काटने लगे।
पहली बार देवदारु को अपने अहंकार का परिणाम समझ आया। वह पीड़ा से कराह उठा—
“बचाओ! कोई मेरी रक्षा करो!”
उसकी पुकार सुनकर कल्पतरु का हृदय द्रवित हो गया।
उसने मधुमक्खियों की रानी से कहा—
“हे देवी! यद्यपि इसने आपका अपमान किया था, फिर भी इसके प्राण संकट में हैं। कृपा करके इसकी रक्षा करें।”
रानी मधुमक्खी बोली—
“हे कल्पतरु! आपका हृदय वास्तव में देवताओं जैसा है।”
यह कहकर हजारों मधुमक्खियाँ असुरों पर टूट पड़ीं। उनके डंक से व्याकुल होकर असुर भाग खड़े हुए।
देवदारु के प्राण बच गए।
उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वह बोला—
“हे मधुमक्खियों! मुझे क्षमा कर दो। मेरे अहंकार ने मुझे अंधा बना दिया था।”
मधुमक्खियों ने उत्तर दिया—
“धन्यवाद हमें नहीं, कल्पतरु को दो। यदि यह चाहता, तो तुम्हें तुम्हारे कर्मों का फल मिलने देता।”
देवदारु ने विनम्र होकर कल्पतरु से कहा—
“आज मैंने समझ लिया कि ऊँचाई से कोई महान नहीं बनता, महान वह बनता है जो दूसरों के काम आता है।”
तभी आकाश से पुष्पवर्षा हुई और एक दिव्य वाणी गूँजी—
“जो अहंकार त्यागकर परोपकार का मार्ग अपनाता है, वही देवताओं का प्रिय बनता है।”
उस दिन से देवदारु का अहंकार समाप्त हो गया और वह भी वन के सभी जीवों की सहायता करने लगा।
अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
जो दूसरों की सहायता करता है, संकट के समय वही सहायता उसे लौटकर मिलती है।
परोपकार से प्रतिष्ठा मिलती है, जबकि अहंकार अंततः पतन का कारण बनता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
