” संयम की जीत “

सर्दियों की एक सुहानी सुबह थी। रेलवे स्टेशन यात्रियों की भीड़ से भरा हुआ था। लोग अपने-अपने सामान के साथ जल्दी-जल्दी ट्रेन पकड़ने में लगे थे। उसी भीड़ में एक समझदार और शांत स्वभाव की युवती, आर्या, भी खड़ी थी। उसे कोलकाता जाना था। ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी तो वह अपनी सीट खोजते हुए डिब्बे में पहुँची।

जब आर्या अपनी सीट के पास पहुँची, तो उसने देखा कि उसकी आरक्षित सीट पर एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठा हुआ था। वह आराम से अखबार पढ़ रहा था। आर्या ने मुस्कुराते हुए कहा, “सर, क्षमा कीजिए, क्या आप अपना टिकट दिखा सकते हैं? मुझे लगता है कि यह सीट मेरी है।”

उस व्यक्ति को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। उसने गुस्से से अखबार नीचे रखा, जेब से टिकट निकाला और ऊँची आवाज़ में बोला, “क्या मतलब तुम्हारी सीट है? पहले अपना टिकट देखो! यह सीट मेरी है। बिना वजह लोगों को परेशान मत करो!”

डिब्बे में बैठे कई यात्री उनकी ओर देखने लगे। लेकिन आर्या ने अपना धैर्य नहीं खोया। उसने शांतिपूर्वक उसका टिकट देखा और बिना कुछ कहे एक तरफ खड़ी हो गई। व्यक्ति मन ही मन मुस्कुराया और सोचने लगा कि लड़की को अपनी गलती समझ आ गई है।

कुछ देर बाद ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली। यात्री अपने-अपने काम में लग गए। लगभग दस मिनट बाद आर्या ने धीरे से उस व्यक्ति से कहा, “सर, क्या मैं आपसे एक बात कह सकती हूँ?”

व्यक्ति ने थोड़े अहंकार से कहा, “हाँ, कहो।”

आर्या बोली, “सर, आप मेरी सीट पर नहीं बैठे हैं। आपकी सीट वास्तव में यही है। लेकिन एक छोटी-सी समस्या है।”

व्यक्ति ने चौंककर पूछा, “क्या समस्या?”

आर्या ने विनम्रता से जवाब दिया, “सर, आपकी टिकट मुंबई जाने वाली ट्रेन की है, जबकि यह ट्रेन कोलकाता जा रही है। आपने सीट तो सही देखी, लेकिन ट्रेन गलत पकड़ ली है।”

यह सुनते ही व्यक्ति के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने घबराकर अपना टिकट दोबारा देखा। फिर खिड़की से बाहर स्टेशन के नाम पढ़ने की कोशिश की। अब उसे अपनी गलती समझ में आ चुकी थी। जल्दबाजी में वह सचमुच गलत ट्रेन में चढ़ गया था।

उसके माथे पर पसीना आ गया। कुछ देर पहले जो व्यक्ति गुस्से से चिल्ला रहा था, अब शर्म से सिर झुकाए बैठा था। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “बेटी, मुझे माफ कर दो। मैंने बिना सोचे-समझे तुम पर गुस्सा किया। तुम चाहती तो मुझे उसी समय सबके सामने शर्मिंदा कर सकती थीं।”

आर्या मुस्कुराई और बोली, “कोई बात नहीं सर। कभी-कभी परिस्थितियाँ हमें अधीर बना देती हैं। लेकिन हर समस्या का समाधान शांति और संयम से ही निकलता है।”

व्यक्ति की आँखों में पश्चाताप था। उसने आर्या को धन्यवाद दिया और अगले स्टेशन पर उतरकर सही ट्रेन पकड़ने की तैयारी करने लगा।

उस दिन डिब्बे में बैठे सभी यात्रियों ने एक अनमोल सीख पाई—क्रोध क्षणिक संतोष देता है, लेकिन संयम जीवनभर सम्मान दिलाता है। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में धैर्य बनाए रखता है, वही वास्तव में मजबूत होता है।

 

संयम और धैर्य सबसे बड़ी शक्ति हैं। क्रोध में लिया गया निर्णय अक्सर गलत होता है, जबकि शांत मन हर समस्या का सही समाधान खोज लेता है।

 

* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार

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