एक नदी में एक मगरमच्छ रहता था। उसी नदी में एक कछुआ भी रहता था। मगरमच्छ जानता था कि वह कछुए को खा नहीं सकता, क्योंकि उसका खोल बहुत मजबूत था। कछुआ भी यह बात अच्छी तरह जानता था कि मगरमच्छ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
एक दिन मगरमच्छ ने कछुए से कहा,
“न तो मैं तुम्हें खा सकता हूँ और न ही तुम मुझे नुकसान पहुँचा सकते हो, इसलिए क्यों न हम दोनों मित्र बन जाएँ?”
कछुए ने शांत स्वर में कहा,
“मित्रता बराबरी वालों में होती है। हम दोनों में बहुत अंतर है।”
यह सुनकर मगरमच्छ को बहुत क्रोध आया। वह बोला,
“यदि ऐसा है तो मैं तुम्हें नदी से बाहर फेंक दूँगा, फिर देखूँगा तुम वापस कैसे आते हो।”
कछुआ चुपचाप उसकी बातें सुनता रहा। फिर बोला,
“लगता है तुमने खरगोश और कछुए की कहानी नहीं सुनी। घमंड करने वाला अंत में हार जाता है।”
यह सुनकर मगरमच्छ और अधिक क्रोधित हो गया। उसने कछुए को धक्का दिया। कछुआ तुरंत अपने खोल में छिप गया। मगरमच्छ उसे उठाकर नदी से बहुत दूर मैदान में फेंक आया।
जब कछुआ अपने खोल से बाहर निकला तो उसने स्वयं को मैदान में पाया। मगरमच्छ बोला,
“यदि फिर कभी नदी में आए तो दोबारा बाहर फेंक दूँगा।”
कछुए ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया,
“कोई बात नहीं, मैं किसी दूसरी नदी में चला जाऊँगा।”
मगरमच्छ हँसते हुए बोला,
“दूसरी नदी बहुत दूर है। तुम वहाँ कभी नहीं पहुँच पाओगे। अब या तो मुझसे क्षमा माँगो या नदी में लौटने का विचार छोड़ दो।”
कछुए ने कहा,
“मैं धीरे-धीरे सही, पर पहुँच जाऊँगा। लेकिन अब वापस नहीं आऊँगा।”
यह सुनकर मगरमच्छ वहाँ से लौट पड़ा। रास्ते में वह भटक गया और एक ऐसे मार्ग पर पहुँच गया जहाँ बहुत गीली और चिकनी मिट्टी थी। जैसे ही वह वहाँ पहुँचा, मिट्टी में धँसने लगा। उसने निकलने की बहुत कोशिश की, पर जितना प्रयास करता उतना ही अधिक धँसता जाता। अब उसे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी।
उधर कछुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। तभी उसे मगरमच्छ की पूँछ की आवाज सुनाई दी। वह पलटकर वापस आया और मगरमच्छ के पास पहुँचा।
मगरमच्छ विनती करते हुए बोला,
“भाई, मुझे यहाँ से बचा लो, नहीं तो मैं मर जाऊँगा।”
कछुए ने कहा,
“तुम्हें तो अपने बल और घमंड पर बहुत अभिमान था। फिर मैं तुम्हारी सहायता क्यों करूँ?”
मगरमच्छ ने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा माँगने लगा। तब कछुए को उस पर दया आ गई। उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से मिट्टी हटानी शुरू कर दी। बहुत देर तक मेहनत करने के बाद मिट्टी धीरे-धीरे बहने लगी और मगरमच्छ बाहर निकलकर पानी तक पहुँच गया।
मगरमच्छ भावुक होकर बोला,
“भाई, मुझे क्षमा कर दो। आज से हम सच्चे मित्र बनकर रहेंगे।”
कछुए ने उसकी मित्रता स्वीकार कर ली। इसके बाद मगरमच्छ कछुए को अपनी पीठ पर बैठाकर नदी में घुमाता और दोनों नदी किनारे पेड़ की छाया में बैठकर प्रेम से बातें किया करते थे।
इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि घमंड कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि घमंडी व्यक्ति अंत में स्वयं ही कठिनाई में पड़ जाता है। हमें हमेशा विनम्र, दयालु और सहायक बनकर रहना चाहिए। सच्ची मित्रता प्रेम, सम्मान और अच्छे व्यवहार से बनती है। साथ ही, क्षमा और दया का भाव दुश्मन को भी मित्र बना सकता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
