सर्दियों की एक ठिठुरती शाम थी। सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था और ठंडी हवाएँ वातावरण को और अधिक शीतल बना रही थीं। घर के भीतर भी माहौल कुछ वैसा ही ठंडा हो चुका था। छोटी-सी बात पर रमेश की अपनी पत्नी सुनीता से कहासुनी हो गई थी। बात इतनी बढ़ गई कि क्रोध में वह घर का दरवाज़ा पटककर बाहर निकल आया।
चलते-चलते वह मन ही मन बड़बड़ाने लगा,
“पता नहीं खुद को क्या समझती है! हर समय तकरार, हर बात में शिकायत। अब उससे बात ही नहीं करूँगा।”
क्रोध और निराशा से भरा रमेश पास ही सड़क किनारे बने एक छोटे-से चाय के स्टॉल पर जा पहुँचा। उसने एक गर्म चाय का आदेश दिया और सामने पड़े स्टूल पर बैठ गया। ठंडी हवा के बीच चाय की भाप उसे कुछ राहत दे रही थी।
तभी पास बैठे एक बुज़ुर्ग ने मुस्कुराकर पूछा,
“इतनी ठंड में बाहर बैठकर चाय पी रहे हो बेटा?”
रमेश ने उनकी ओर देखा। सफेद बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा और आँखों में एक अजीब-सी उदासी थी। रमेश ने हल्के स्वर में कहा,
“आप भी तो इस उम्र में इतनी ठंड में बाहर बैठे हैं।”
बुज़ुर्ग धीमे से हँसे और बोले,
“मैं अकेला हूँ बेटा। न कोई घर की चिंता, न कोई साथी। लेकिन तुम तो शादीशुदा लगते हो।”
रमेश के मन का गुबार फूट पड़ा। उसने कहा,
“पत्नी जीने नहीं देती। हर समय झगड़ा, हर समय शिकायत। घर में शांति ही नहीं रहती। इसलिए बाहर निकल आया।”
बुज़ुर्ग कुछ क्षण चुप रहे। फिर गहरी साँस लेकर बोले,
“बरखुरदार, पत्नी जीने नहीं देती नहीं… पत्नी से ही जीवन होता है।”
उनकी आवाज़ में ऐसा दर्द था कि रमेश अनायास उनकी ओर देखने लगा।
बुज़ुर्ग की आँखें नम हो गईं। वे धीमे स्वर में बोले,
“आठ वर्ष हो गए मेरी पत्नी को इस दुनिया से गए हुए। जब वह जीवित थी, तब उसकी अहमियत कभी समझ नहीं पाया। उसकी छोटी-छोटी बातों पर झुंझला जाता था। लेकिन जब वह चली गई, तब समझ आया कि घर की असली रौनक वही थी।”
उन्होंने काँपते हाथों से चाय का प्याला उठाया और आगे बोले,
“आज बड़ा घर है, धन-दौलत है, बच्चे भी हैं… पर सब अपने जीवन में व्यस्त हैं। घर अब घर नहीं लगता, बस दीवारें रह गई हैं। उसकी हँसी, उसकी डाँट, उसकी चिंता… सब कुछ याद आता है। अब तो यूँ ही समय काटने के लिए कभी इधर, कभी उधर भटकता रहता हूँ।”
यह कहते-कहते उनकी आँखों से आँसू बह निकले।
रमेश का हृदय भीतर तक काँप उठा। उसे अपनी पत्नी की बातें याद आने लगीं— समय पर खाना देना, उसकी चिंता करना, ठंड में गर्म कपड़े निकालकर रखना। उसे एहसास हुआ कि जिन बातों को वह झगड़ा समझता था, वे वास्तव में प्रेम और अपनापन थे।
उसने तुरंत चाय के पैसे दिए और तेज़ कदमों से घर की ओर चल पड़ा।
घर के पास पहुँचते ही उसने देखा कि सुनीता दरवाज़े पर खड़ी थी। उसकी आँखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह घबराए स्वर में बोली,
“कहाँ चले गए थे? जैकेट भी नहीं पहनी। इतनी ठंड में बाहर घूम रहे हो, बीमार पड़ जाते तो?”
रमेश ने मुस्कुराकर कहा,
“और तुम भी तो बिना स्वेटर के दरवाज़े पर खड़ी हो।”
दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे। उस मौन में शिकायतें नहीं थीं, केवल प्रेम था। उनकी आँखों ने वह कह दिया, जिसे शब्द कभी नहीं कह पाते।
उस दिन रमेश समझ गया कि जीवन में सबसे अनमोल वही होता है, जो हर परिस्थिति में हमारे साथ खड़ा रहता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
