एक कन्या विद्यालय में नई अध्यापिका आईं। वे अत्यंत सुंदर, शिक्षित और सौम्य स्वभाव की थीं। उनकी आयु विवाह योग्य सीमा से कुछ अधिक हो चुकी थी, फिर भी उन्होंने विवाह नहीं किया था।
विद्यालय की छात्राएँ अक्सर उनके बारे में तरह-तरह के अनुमान लगाती रहती थीं। एक दिन विद्यालय के वार्षिक समारोह के बाद कुछ छात्राएँ उनके पास खड़ी थीं। तभी एक जिज्ञासु छात्रा ने विनम्रता से पूछा,
“मैडम, आपने अब तक विवाह क्यों नहीं किया?”
अध्यापिका कुछ क्षण मौन रहीं। फिर मुस्कराकर बोलीं,
“मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ। उसी में तुम्हारे प्रश्न का उत्तर छिपा है।”
उन्होंने कहना प्रारंभ किया—
“एक परिवार में एक दंपति रहता था। पति को पुत्र की अत्यधिक इच्छा थी। लेकिन ईश्वर की इच्छा से उनके घर लगातार पाँच बेटियाँ जन्मीं। जब पत्नी छठी बार गर्भवती हुई, तो पति ने क्रोधित होकर कहा,
‘यदि इस बार भी बेटी हुई, तो मैं उसे किसी चौराहे पर छोड़ आऊँगा।’
बेचारी माँ यह सुनकर भीतर ही भीतर टूट गई। वह जानती थी कि संतान का लिंग मनुष्य के हाथ में नहीं होता। उसने भगवान से प्रार्थना की, लेकिन इस बार भी बेटी ही हुई।
पिता ने अपनी प्रतिज्ञा निभाने के लिए उस नवजात बच्ची को रात के अँधेरे में शहर के एक सुनसान चौराहे पर छोड़ दिया। माँ पूरी रात रोती रही और भगवान से उसकी रक्षा की प्रार्थना करती रही।
अगली सुबह पिता यह देखने गया कि बच्ची का क्या हुआ। उसने देखा कि वह अब भी वहीं जीवित पड़ी है। वह उसे वापस घर ले आया। किंतु अगली रात फिर उसे उसी स्थान पर छोड़ आया। कई दिनों तक यही क्रम चलता रहा। हर बार वह बच्ची सुरक्षित मिल जाती और पिता उसे विवश होकर घर ले आता।
आख़िरकार पिता ने इसे ईश्वर की इच्छा मानकर उसे स्वीकार कर लिया।
कुछ समय बाद माँ फिर गर्भवती हुई और इस बार पुत्र का जन्म हुआ। लेकिन दुर्भाग्यवश उसी वर्ष छह बेटियों में से एक बेटी का निधन हो गया। इसके बाद जब भी पुत्र जन्म लेता, संयोगवश बेटियों में से एक इस संसार से विदा हो जाती। धीरे-धीरे पाँचों बेटियाँ काल के गाल में समा गईं। अंत में केवल एक ही बेटी जीवित बची—वही, जिसे उसके पिता कभी घर से दूर छोड़ आना चाहते थे।
इतना कहते-कहते अध्यापिका की आँखें नम हो गईं। उन्होंने आँसू पोंछे और आगे बोलीं—
“वह जीवित बची बेटी मैं ही हूँ।”
पूरा कक्ष एकदम शांत हो गया।
उन्होंने आगे कहा—
“कुछ वर्षों बाद मेरी माँ का भी देहांत हो गया। मेरे पाँचों भाई बड़े होकर अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। सभी अलग-अलग रहने लगे। आज मेरे पिता इतने वृद्ध हो चुके हैं कि अपने हाथों से भोजन भी नहीं कर सकते। उनकी देखभाल करने वाला घर में कोई नहीं है। इसलिए मैंने विवाह नहीं किया। मैं अपने पिता की सेवा को ही अपना सबसे बड़ा धर्म मानती हूँ।”
उन्होंने भावुक होकर कहा—
“आज मेरे पिताजी प्रतिदिन आँसुओं के साथ मुझसे कहते हैं—
‘बेटी, बचपन में मैंने तेरे साथ जो अन्याय किया, उसके लिए मुझे क्षमा कर दे।'”
फिर अध्यापिका ने एक और प्रसंग सुनाया।
“एक पिता अपने छोटे बेटे के साथ खेल रहे थे। बेटे का उत्साह बढ़ाने के लिए पिता जानबूझकर हार जाते थे। पास बैठी छोटी बेटी यह देखकर रो पड़ी। वह दौड़कर अपने पिता से लिपट गई और बोली—
‘पापा, आप मेरे साथ खेलिए। मैं आपकी जीत के लिए खुशी-खुशी हार जाऊँगी।'”
अध्यापिका ने मुस्कराते हुए कहा—
“यही होती हैं बेटियाँ। वे केवल जन्म नहीं देतीं, बल्कि अपने प्रेम, त्याग, सेवा और समर्पण से पूरे परिवार को जीवनभर सँभालती हैं।”
बेटियाँ ईश्वर का अनमोल उपहार हैं। उनका सम्मान करें, उन्हें समान अवसर दें और कभी भी पुत्र-पुत्री में भेदभाव न करें। समय आने पर वही बेटी परिवार का सबसे बड़ा सहारा बन सकती है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
