कॉलेज का सभागार लोगों से भरा हुआ था। मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— “Happy Married Life”। कार्यक्रम में कई शादीशुदा जोड़े शामिल हुए थे। माहौल बड़ा खुशनुमा था। पति-पत्नी एक-दूसरे पर मज़ाक कर रहे थे, हँसी-ठिठोली चल रही थी और पूरा हॉल ठहाकों से गूंज रहा था।
कुछ ही देर में मनोविज्ञान के प्रोफेसर मंच पर आए। उन्होंने देखा कि सभी लोग शादी को केवल मज़ाक और हल्के रिश्ते की तरह ले रहे हैं। प्रोफेसर मुस्कुराए और बोले,
“आज मैं आपको भाषण देने से पहले एक छोटा-सा खेल खिलाना चाहता हूँ।”
सब लोग उत्साहित हो गए। सभी ने एक साथ पूछा,
“कौन-सा खेल सर?”
प्रोफेसर ने सामने बैठी एक विवाहित महिला, नीलिमा, को मंच पर बुलाया। फिर उन्होंने उसे ब्लैकबोर्ड पर उन 25-30 लोगों के नाम लिखने को कहा जो उसके जीवन में सबसे अधिक प्रिय थे।
नीलिमा ने सबसे पहले अपने माता-पिता के नाम लिखे। फिर पति, बेटे, भाई-बहन, रिश्तेदार, दोस्त, पड़ोसी और सहकर्मियों के नाम लिख दिए। कुछ ही मिनटों में पूरा बोर्ड नामों से भर गया।
अब प्रोफेसर बोले,
“इनमें से पाँच ऐसे लोगों के नाम मिटा दो जिन्हें तुम सबसे कम पसंद करती हो।”
नीलिमा ने थोड़ा सोचा और अपने सहकर्मियों के नाम मिटा दिए।
प्रोफेसर ने फिर कहा,
“अब पाँच और नाम मिटाओ।”
इस बार उसने पड़ोसियों के नाम हटा दिए।
धीरे-धीरे खेल आगे बढ़ता गया। प्रोफेसर हर बार कुछ नाम मिटाने को कहते और नीलिमा भारी मन से वैसा करती जाती। अब उसने दोस्तों और दूर के रिश्तेदारों के नाम भी मिटा दिए।
कुछ देर बाद ब्लैकबोर्ड पर केवल चार नाम बचे थे—
मम्मी, पापा, पति और बेटा।
पूरा हॉल अब शांत हो चुका था। सबकी निगाहें नीलिमा पर थीं। अब यह खेल केवल उसका नहीं, बल्कि वहाँ बैठे हर व्यक्ति की भावनाओं का हिस्सा बन चुका था।
प्रोफेसर ने गंभीर स्वर में कहा,
“अब इनमें से दो नाम और मिटा दो।”
नीलिमा के हाथ काँपने लगे। उसकी आँखें भर आईं। उसने कई बार बोर्ड की ओर देखा। फिर गहरी साँस लेते हुए उसने अपने माता-पिता का नाम मिटा दिया।
पूरा हॉल स्तब्ध रह गया। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि एक बेटी ने अपने माता-पिता का नाम हटा दिया।
अब बोर्ड पर सिर्फ दो नाम थे— पति और बेटा।
प्रोफेसर ने एक बार फिर कहा,
“अब इनमें से एक नाम और मिटा दो।”
यह सुनते ही नीलिमा की आँखों से आँसू बहने लगे। वह कुछ देर तक चुप खड़ी रही। ऐसा लग रहा था मानो उसका दिल टूट रहा हो। काफी देर सोचने के बाद उसने काँपते हाथों से अपने बेटे का नाम भी मिटा दिया।
अब बोर्ड पर केवल एक नाम बचा था— पति।
पूरा सभागार बिल्कुल शांत था। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कुछ बोलने की।
प्रोफेसर ने नीलिमा से पूछा,
“तुमने ऐसा क्यों किया? जिन माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया, पाल-पोस कर बड़ा किया, उनका नाम मिटा दिया। और जिस बेटे को तुमने अपनी कोख से जन्म दिया, उसका भी नाम हटा दिया। आखिर क्यों?”
नीलिमा ने आँसू पोंछते हुए धीमे स्वर में कहा,
“मेरे माता-पिता बूढ़े हो चुके हैं। एक दिन ऐसा आएगा जब वे मुझे छोड़कर इस दुनिया से चले जाएंगे। मेरा बेटा बड़ा होकर अपनी दुनिया बसा लेगा। शायद शादी के बाद वह मेरे साथ रहे या न रहे। लेकिन मेरे पति… वे हर सुख-दुख में मेरा साथ निभाएंगे। वे मेरे जीवनसाथी हैं, मेरे आधे अंग की तरह हैं। जब तक मेरी साँस चलेगी, उनका साथ मेरे साथ रहेगा। इसलिए मेरे लिए सबसे अनमोल मेरे पति हैं।”
उसकी बात सुनते ही पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कई लोगों की आँखें नम थीं।
प्रोफेसर मुस्कुराए और बोले,
“जीवन में हर रिश्ता महत्वपूर्ण होता है, लेकिन पति-पत्नी का रिश्ता सबसे अलग होता है। यह केवल साथ रहने का नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में एक-दूसरे का सहारा बनने का रिश्ता है। मज़ाक अपनी जगह ठीक है, लेकिन सच्चाई यही है कि जीवनसाथी ही वह इंसान होता है जो अंत तक हमारे साथ चलता है।”
उस दिन वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने रिश्तों की गहराई को एक नए नजरिए से समझा।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
