एक बार की बात है, किसी छोटे से रेलवे स्टेशन पर गाड़ी आकर रुकी। प्लेटफॉर्म पर हलचल बढ़ गई—कोई उतर रहा था, कोई चढ़ रहा था, और कुछ छोटे-छोटे बच्चे अपनी जीविका के लिए पानी, चाय और खाने-पीने की चीज़ें बेच रहे थे। उन्हीं में एक दुबला-पतला, मासूम-सा लड़का भी था, जिसके कंधे पर एक छोटा-सा घड़ा टंगा हुआ था। वह जोर-जोर से आवाज लगा रहा था—“पानी ले लो… ठंडा पानी…!”
उसी समय ट्रेन के एक डिब्बे में बैठे एक धनवान सेठ की नज़र उस लड़के पर पड़ी। सेठ ने ऊँची आवाज़ में पुकारा, “ऐ लड़के, इधर आ!”
लड़का तुरंत दौड़ता हुआ आया और आदरपूर्वक बोला, “जी सेठ जी?”
सेठ ने कहा, “एक गिलास पानी दे।”
लड़के ने तुरंत घड़े से ताज़ा पानी भरकर गिलास सेठ की ओर बढ़ा दिया। तभी सेठ ने पूछा, “कितने पैसे का है?”
लड़के ने विनम्रता से उत्तर दिया, “पच्चीस पैसे, सेठ जी।”
सेठ ने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “पंद्रह पैसे में देगा क्या?”
यह सुनते ही लड़का हल्के से मुस्कुराया, बिना कुछ कहे गिलास का पानी वापस घड़े में उड़ेल दिया और चुपचाप आगे बढ़ गया।
उसी डिब्बे में एक महात्मा भी बैठे हुए थे। उन्होंने यह पूरा दृश्य ध्यान से देखा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, केवल मुस्कुराया और चला गया। उस मुस्कान में जैसे कोई गहरा रहस्य छिपा था।
महात्मा जी की जिज्ञासा बढ़ी। वे तुरंत ट्रेन से उतरकर उस लड़के के पीछे-पीछे गए और उसे आवाज़ दी, “बेटा, ज़रा ठहरो।”
लड़का रुक गया और आदर से बोला, “जी महाराज?”
महात्मा ने पूछा, “तुम अभी मुस्कुराए क्यों थे? सेठ ने तुमसे मोल-भाव किया, फिर भी तुमने कुछ कहा नहीं, बस मुस्कुरा दिए। इसका क्या कारण है?”
लड़का विनम्रता से बोला, “महाराज, मुझे हंसी इसलिए आई क्योंकि सेठ जी को वास्तव में प्यास लगी ही नहीं थी।”
महात्मा ने आश्चर्य से पूछा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगा?”
लड़का बोला, “महाराज, जिसे सच में प्यास लगी होती है, वह कभी पानी का दाम नहीं पूछता। वह तो पहले पानी पीता है, अपनी प्यास बुझाता है, और फिर बाद में पूछता है कि कितने पैसे देने हैं। लेकिन जो पहले ही दाम पूछने लगे, इसका मतलब है कि उसकी प्यास सच्ची नहीं है।”
महात्मा जी यह उत्तर सुनकर गहरे विचार में डूब गए। एक छोटे से बालक ने कितनी बड़ी बात सहज ही कह दी थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुमने तो बहुत गूढ़ सत्य बता दिया।”
लड़का बोला, “महाराज, यही बात जीवन में भी लागू होती है। जिन लोगों को सच में कुछ पाने की चाह होती है—चाहे वह ज्ञान हो, ईश्वर हो या सफलता—वे कभी तर्क-वितर्क में समय नहीं गंवाते। वे सीधे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं। पर जिनकी चाहत सच्ची नहीं होती, वे बहस में उलझे रहते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते।”
महात्मा जी उस बालक की बात सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और मन ही मन सोचा कि सत्य और ज्ञान उम्र के मोहताज नहीं होते, वे तो कहीं से भी मिल सकते हैं।
उस दिन के बाद महात्मा जी ने अपने शिष्यों को भी यही सिखाया कि जीवन में सच्ची प्यास बहुत जरूरी है। यदि मन में ईश्वर को पाने की सच्ची लगन हो, तो व्यक्ति किसी भी कठिनाई से नहीं डरता।
वास्तव में, यदि भगवान नहीं हैं तो उनका स्मरण क्यों किया जाए, और यदि वे हैं, तो फिर चिंता किस बात की? जीवन में जो कुछ भी हम खोते हैं, वह हमारी नादानी का परिणाम होता है, और जो कुछ भी पाते हैं, वह ईश्वर की कृपा होती है।
मनुष्य का जन्म और मृत्यु उसके हाथ में नहीं होते, परंतु जीवन को कैसे जीना है, यह पूर्णतः उसके हाथ में है। इसलिए हमें चाहिए कि हम जीवन को हँसी, प्रेम और भक्ति से भर दें।
जीवन का आरंभ हमारे रोने से होता है और अंत दूसरों के रोने से, लेकिन इन दोनों के बीच का समय यदि हम मुस्कान, सेवा और ईश्वर-भक्ति से भर दें, तो वही सच्चा और सफल जीवन कहलाता है!!
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
