” आखिरी मालकिन “

आज अम्मा बहुत सुबह उठ गई थीं। रात भर उन्हें ठीक से नींद भी नहीं आई थी। मन में एक अजीब-सी खुशी और हल्की-सी घबराहट थी। जैसे कोई बहुत बड़ा काम आज पूरा होने वाला हो। स्नान करके वे पूजा के सामने बैठीं, आँखें बंद करके भगवान से कुछ बुदबुदाईं और फिर धीरे-धीरे अपने कमरे में आकर पलंग के नीचे रखा पुराना लोहे का संदूक बाहर खींच लिया। वह संदूक उनके जीवन का इतिहास था। उस पर लगी जंग जैसे बीते वर्षों की कहानी कह रही थी। अम्मा ने काँपते हाथों से ताला खोला। अंदर लाल कपड़ों में लिपटी छोटी-छोटी पोटलियाँ थीं। उन्होंने एक-एक पोटली खोलनी शुरू की। उसमें चाँदी के छोटे-बड़े चम्मच, कटोरियाँ, लोटे, गिलास, सिंदूरदान, इत्तरदान, और वह पुराना चाभी होल्डर था जिसे उनकी सास कमर में खोंसकर रखती थीं। हर चीज़ को हाथ में लेते ही अम्मा की आँखों के सामने पुरानी यादें तैरने लगतीं। यह कटोरी उनकी शादी में मिली थी… यह गिलास तब मिला था जब उनके बेटे का जन्म हुआ था… और यह सिंदूरदान उनकी सास ने आशीर्वाद देकर दिया था। इन चाँदी के बर्तनों में सिर्फ धातु नहीं थी, उनमें पीढ़ियों का प्यार और आशीर्वाद भरा था।

अम्मा का इकलौता बेटा शादी के बाद शहर में नौकरी करने चला गया था। बहू भी उसके साथ ही रहती थी। सालों बाद पहली बार बहू तीन-चार दिन के लिए घर आई थी। अम्मा का मन खुशी से भर गया था। उन्हें लगा था कि अब वह अपनी इस पुश्तैनी विरासत को बहू के हाथों में सौंपकर निश्चिंत हो जाएँगी। कल शाम उन्होंने बहू को अपने पास बुलाया और यही संदूक खोलकर उसके सामने बैठ गईं। एक-एक बर्तन निकालकर उसकी कहानी सुनाती रहीं। उनके चेहरे पर गर्व था और आँखों में उम्मीद कि बहू इन सबको उसी प्यार से अपनाएगी। आखिर में अम्मा ने लाल कपड़े में सब बर्तन बाँधकर बहू की ओर बढ़ाते हुए कहा, “बेटी, यह हमारे खानदान की निशानी है। आज मैं इसे तुम्हें सौंपना चाहती हूँ। इसे अपने साथ ले जाओ और संभालकर रखना।”

पर बहू के चेहरे पर खुशी नहीं, बल्कि असहजता झलक आई। उसने थोड़ा हिचकते हुए कहा, “अम्मा जी, मैं इन चीज़ों का क्या करूँगी? न तो मैं इन्हें इस्तेमाल करूँगी और न ही मेरे लॉकर में इतनी जगह है। वैसे भी आजकल ऐसी पुश्तैनी चीज़ें या तो पड़ी-पड़ी खराब हो जाती हैं, किसी के कब्ज़े में चली जाती हैं या बेच दी जाती हैं। अगर इनके साथ भी ऐसा हुआ तो आपको बहुत दुख होगा।”

बहू की यह साफ-साफ बात सुनकर अम्मा कुछ पल तक चुप रह गईं। जैसे उनके अंदर कुछ टूट गया हो। उनके हाथों में पकड़ी चाँदी की पोटली धीरे-धीरे काँपने लगी। जिन चीज़ों को वे इतने सालों से संभालकर रखती आई थीं, आज वही किसी के लिए बोझ बन गई थीं। कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। तभी अचानक घर की घंटी बज उठी।

अम्मा ने चुपचाप पोटली उठाई और दरवाज़े की ओर बढ़ने लगीं। उनके होंठों पर हल्की-सी बुदबुदाहट थी, “लगता है सुनार आ गया… पुश्तैनी चीज़ों की कीमत एक ख़ानदानी जौहरी ही समझ सकता है। नए जमाने के बच्चों को क्या पता कि विरासत लॉकरों में नहीं, दिलों में बसती है।”

दरवाज़ा खोलते समय उनकी आँखों में आँसू थे। उस पल अम्मा समझ चुकी थीं कि अब इस खानदान की विरासत की वे ही आख़िरी मालकिन हैं… और उनके बाद शायद यह कहानी भी चाँदी की तरह गलकर कहीं खो जाएगी।

 

*राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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