झुंझुनूं की जिला अदालत में उस दिन असामान्य खामोशी थी। कोर्ट रूम में बैठे लोगों की नजरें जज साहब पर टिकी थीं। तभी जज ने हथौड़ा बजाया और गंभीर आवाज में फैसला सुनाया—
“मिसेज चौधरी को हर महीने पचास हजार रुपये गुजारा भत्ता दिया जाएगा। इसके साथ ही शादी वाला घर और कार भी उन्हीं के पास रहेगी। मिस्टर चौधरी को एक सप्ताह के अंदर घर खाली करना होगा। कोर्ट की कार्यवाही समाप्त होती है।”
जज के हथौड़े की आवाज जैसे राघव चौधरी के दिल पर हथौड़ा बनकर गिरी। कटघरे में खड़ा राघव कुछ पल के लिए सुन्न हो गया। उसकी सांसें तेज हो गईं और दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था—अब क्या होगा?
राघव की कुल सैलरी एक लाख रुपये थी। उसमें से पचास हजार हर महीने पूर्व पत्नी नेहा को देने होंगे। बाकी पचास हजार में वह अपने बूढ़े माता-पिता की दवाइयां, घर का किराया और अपना खर्च कैसे चलाएगा?
कांपती आवाज में उसने कहा,
“माई लॉर्ड… ये अन्याय है। मेरे बूढ़े माता-पिता हैं। पिताजी हार्ट के मरीज हैं और माँ को डायबिटीज है। उनकी दवाइयों का खर्च…”
लेकिन तब तक जज अपनी फाइल समेट चुके थे। उन्होंने राघव की बात सुने बिना ही कोर्ट छोड़ दी।
राघव वहीं खड़ा रह गया।
तभी नेहा के वकील, एडवोकेट मेहता, फाइल हाथ में लिए मुस्कराते हुए उसके पास आए।
“मिस्टर चौधरी,” उन्होंने ताना मारते हुए कहा, “अब भावनात्मक भाषण देने से कुछ नहीं होगा। कोर्ट में भावनाएं नहीं, सबूत चलते हैं। और सबूत बताते हैं कि आपने मेरी क्लाइंट को मानसिक प्रताड़ना दी है।”
राघव की आंखों में गुस्सा भर आया।
“ये सब झूठ है!” उसने कहा।
“मैंने नेहा के लिए क्या नहीं किया? ऑफिस से थककर आने के बाद भी उसके लिए खाना बनाया, उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश की…”
“बस कीजिए,” वकील ने बीच में टोक दिया।
“फैसला हो चुका है। इन कागजों पर साइन कीजिए और एक हफ्ते में घर खाली कर दीजिए।”
राघव ने धीमे कदमों से सामने वाली बेंच की तरफ देखा। वहां नेहा चौधरी बैठी थी। महंगी साड़ी, हाथ में महंगा पर्स और चेहरे पर जीत की हल्की मुस्कान।
छह साल पहले इसी लड़की से उसने पूरे प्यार से शादी की थी।
राघव धीरे-धीरे उसके पास गया।
“नेहा…” उसकी आवाज भर्रा गई।
नेहा ने काला चश्मा हटाया और ठंडी नजरों से उसे देखा।
“अब क्या चाहिए?” उसने रूखेपन से कहा।
राघव ने दर्द भरी मुस्कान के साथ कहा,
“हमारी छह साल की शादी… क्या वो सब तुम्हारे लिए बस एक खेल था? तुम जानती हो मेरी सैलरी क्या है। मेरे माँ-पापा मुझ पर निर्भर हैं। मैं सब कैसे संभालूंगा?”
नेहा ने कंधे उचकाए।
“वो तुम्हारी समस्या है, मेरी नहीं,” उसने कहा।
“तुम्हारी उस छोटी-सी मिडिल क्लास दुनिया में मेरा दम घुट रहा था। मुझे बड़ी जिंदगी चाहिए थी… लग्जरी चाहिए थी।”
राघव स्तब्ध रह गया।
“मैंने अपनी हैसियत से ज्यादा तुम्हें खुश रखने की कोशिश की,” उसने धीमे स्वर में कहा।
“पिछले महीने ही लोन लेकर तुम्हें नया फोन दिलाया। तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कश्मीर घुमाने ले गया…”
नेहा हंस पड़ी।
“राघव, फोन और टूर से जिंदगी नहीं बदलती,” उसने तिरस्कार से कहा।
“तुम्हारी सोच बहुत छोटी है। मैं ऊंचा उड़ना चाहती थी… और तुम मुझे एक साधारण जिंदगी में कैद करके रखना चाहते थे।”
राघव का गला भर आया।
“तो इसलिए तुमने मुझ पर झूठे आरोप लगाए?” उसने कहा।
“कोर्ट में कहा कि मैं तुम्हें मारता हूँ… मैं शराब पीता हूँ… जबकि तुम जानती हो मैंने कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाया।”
नेहा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपना पर्स उठाया और बाहर की ओर चल दी।
दरवाजे तक पहुंचकर वह एक पल को रुकी और बोली—
“राघव, जिंदगी में आगे बढ़ना सीखो। भावनाओं से नहीं… पैसों से दुनिया चलती है।”
और वह बाहर चली गई।
कोर्ट के खाली कमरे में अब सिर्फ राघव खड़ा था।
जिस घर को उसने अपने सपनों से बनाया था… आज वह घर, वह रिश्ता और वह भरोसा—सब कुछ उससे छिन चुका था।
उसकी आंखों से आंसू गिर पड़े।
लेकिन उसी पल उसने मन ही मन ठान लिया कि वह दिन रात मेहनत करके नई दुनिया बसायेगा और अपने बूढ़े माता पिता की सेवा करेगा !
कभी-कभी जिंदगी हमें गिराती जरूर है, लेकिन वही गिरावट हमें फिर से मजबूत बनना भी सिखाती है !
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
