सुबह की हल्की धूप में सड़क किनारे एक बूढ़ी माँ, अपनी पुरानी सी डलिया में संतरे सजाए बैठी रहती थी। चेहरे पर झुर्रियाँ थीं, पर आँखों में अजीब सा सुकून।
उसी राह से रोज़ एक युवा अपनी पत्नी के साथ गुज़रता। वह अक्सर उसी बूढ़ी माँ से संतरे खरीदता।
हर बार वही दृश्य दोहराया जाता—
युवा एक संतरा उठाता, उसकी एक फाँक तोड़कर चखता और माथा सिकोड़ते हुए कहता,
“अरे माँ, ये तो कुछ कम मीठा लग रहा है!”
बूढ़ी माँ भी संतरा चखती, मुस्कुराकर जवाब देती—
“ना बाबू… मीठा तो है।”
युवा हल्की सी गर्दन झटकता, वही संतरा छोड़ देता और बाकी संतरे लेकर आगे बढ़ जाता।
यह सिलसिला रोज़ का था।
एक दिन पत्नी से रहा नहीं गया। उसने पूछा—
“तुम रोज़ यही नौटंकी क्यों करते हो? संतरे तो सच में मीठे होते हैं!”
युवा ने मुस्कुराते हुए कहा—
“वो माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है… लेकिन खुद कभी नहीं खाती।
मेरे पास उसे सीधे खिलाने का हक़ नहीं,
तो मैं बहाने से उसे संतरा खिला देता हूँ।”
कुछ दिन बाद पास में सब्ज़ी बेचने वाली औरत ने बूढ़ी माँ से कहा—
“वो लड़का तो अजीब है, हर बार चखता है…
पर मैंने देखा है, तुम हर बार उसकी चख-चख में पलड़े में ज़्यादा संतरे डाल देती हो।”
बूढ़ी माँ की आँखें भर आईं।
वह बोली—
“वो संतरे नहीं चखता बेटी… वो मेरा अकेलापन चखता है।
वो समझता है मैं उसकी चाल नहीं समझती,
पर मैं उसकी नीयत पढ़ लेती हूँ।
इसीलिए पलड़े पर संतरे अपने आप बढ़ जाते हैं।”
फिर आसमान की ओर देखते हुए बोली—
“मेरी हैसियत से ज़्यादा मेरी थाली में परोसने वाले…
तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक,
मुझे तुझ पर भरोसा है।”
और सच ही तो है—
छीनकर खाने वालों का पेट कभी नहीं भरता,
और बाँटकर खाने वाला कभी भूखा नहीं मरता।
सच्ची सेवा दिखावे से नहीं, नीयत से होती है।जो मिला है, वही पर्याप्त मानना सीखो।
जिसका मन संतुष्ट है, उसके पास सब कुछ है।
जो बाँटना सीख गया,
वो जीवन की सबसे बड़ी कमाई पा गया।
– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
