प्राचीन काल की बात है, एक गुरुकुल में ‘वरदराज’ नाम का एक बालक शिक्षा ग्रहण करता था।
वरदराज स्वभाव से अत्यंत सरल और परिश्रमी था, लेकिन उसकी बुद्धि अन्य छात्रों की तुलना में बहुत मंद थी। उसे जो भी पढ़ाया जाता, वह उसे भूल जाता था। सहपाठी उसका उपहास उड़ाते और अंततः गुरुजी ने भी निराश होकर उसे घर लौट जाने को कह दिया। दुखी मन से वरदराज अपना सामान समेटकर घर की ओर निकल पड़ा।
प्रकृति नव-श्रृंगार कर रही थी, लेकिन वरदराज के मन में अंधकार था। चलते-चलते उसे प्यास लगी, तो वह एक कुएँ के पास रुका। वहाँ उसने देखा कि कुएँ के पत्थर पर रस्सी के बार-बार आने-जाने से गहरे निशान बन गए थे। उसे अचानक बोध हुआ कि यदि कोमल रस्सी के बार-बार रगड़ने से कठोर पत्थर कट सकता है, तो निरंतर अभ्यास से मेरी मंद बुद्धि में ज्ञान का प्रवेश क्यों नहीं हो सकता? उसी क्षण उसने वापस गुरुकुल लौटने का निर्णय लिया। संयोगवश उस दिन बसन्त पंचमी थी, उसने पास के सरोवर में स्नान किया और माँ सरस्वती का ध्यान कर यह संकल्प लिया कि वह अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। उसने अपनी पूरी शक्ति और एकाग्रता पढ़ाई में झोंक दी। माँ सरस्वती की कृपा और उसके अथक परिश्रम का परिणाम यह हुआ कि वही ‘वरदराज’ आगे चलकर संस्कृत के महान विद्वान बने और ‘लघुसिद्धांतकौमुदी’ जैसे महान ग्रंथ की रचना की। बसन्त पंचमी का यह दिन उनके जीवन में ज्ञान का नया सवेरा लेकर आया।
यह कहानी हमें यह अमूल्य पाठ पढ़ाती है कि दुनिया में कोई भी कार्य असंभव नहीं है और न ही कोई व्यक्ति जन्म से मूर्ख होता है। ‘करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान’ के सिद्धांत के अनुसार, यदि हम दृढ़ संकल्प, निरंतर अभ्यास और धैर्य के साथ किसी लक्ष्य की ओर बढ़ें, तो साक्षात् ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की कृपा हमें प्राप्त होती है। सफलता की कुंजी केवल कुशाग्र बुद्धि में नहीं, बल्कि कभी हार न मानने वाले हमारे अटूट प्रयास और सकारात्मक दृष्टिकोण में निहित है।
——– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
