काफी समय से दादी की तबीयत बहुत खराब चल रही थी। घर में ही दो नर्स उनकी देखभाल में लगी रहती थीं। बड़े-बड़े डॉक्टर आ चुके थे, जाँचें हो चुकी थीं, दवाइयाँ बदल चुकी थीं, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं था। आखिरकार डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कह दिया—“अब जो भी सेवा करनी है, कर लीजिए… दवाइयाँ अपना असर नहीं दिखा रहीं।”
घर का माहौल भारी हो गया। बेटे-बहू दोनों नौकरीपेशा थे, मजबूरी में बच्चों को हॉस्टल में रखा गया था। जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, तो उन्होंने बच्चों को हॉस्टल से घर बुला लिया, ताकि वे दादी को आख़िरी बार देख सकें। रोज़ सुबह माता-पिता ऑफिस चले जाते और बच्चे बार-बार दादी के कमरे में झाँकने जाते।
एक दिन दादी ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोलीं। बच्चों को देखते ही वे उनसे लिपट गए। मासूमियत से बोले,
“दादी… पापा कहते हैं कि आप बहुत अच्छा खाना बनाती हो। हमें हॉस्टल का खाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। क्या आप हमारे लिए खाना बनाओगी?”
नर्स ने तुरंत बच्चों को डाँट दिया—“अभी दादी को आराम चाहिए, बाहर जाओ।”
लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ। दादी अचानक उठ बैठीं और नर्स पर बरस पड़ीं—
“खबरदार! मेरे बच्चों को डाँटने का हक़ किसने दिया? अभी जाओ यहाँ से।”
नर्स हैरान रह गई। बोली, “हम तो आपकी भलाई के लिए ही बच्चों को मना कर रहे हैं। ये बार-बार आते हैं, आपको डिस्टर्ब करते हैं, आपको आराम नहीं करने देते।”
दादी मुस्कुरा दीं।
“इनको देखकर मेरी आँखों और दिल को जो सुकून मिलता है, वो तू क्या जाने? ऐसा कर, मुझे ज़रा नहाना है, बाथरूम तक ले चल।”
नर्स अवाक थी। कल तक जो दादी बिस्तर से उठ नहीं पा रही थीं, आज उनमें यह ताकत कहाँ से आ गई? नहाने के बाद दादी ने रसोई में जाने की ज़िद की। नर्स ने मना किया, लेकिन दादी के आग्रह पर वह मदद करने लगी।
खाना बना। दादी ने बच्चों को बुलाया और कहा,
“आज हम ज़मीन पर बैठकर खाएँगे, और खाना तुम लोग मेरे हाथ से खाओगे।”
दादी के चेहरे पर अजीब सी चमक थी। वे बच्चों को अपने हाथों से खिलाने लगीं। बच्चों ने भी प्यार से दादी के मुँह में निवाले दिए। दादी की आँखों से आँसू बह निकले।
बच्चों ने घबराकर पूछा, “दादी, आपको दर्द हो रहा है क्या? मैं आपके पैर दबा दूँ?”
दादी ने प्यार से सिर सहलाया—
“नहीं बेटा… आज तेरे बाप की याद आ गई। वो भी ऐसे ही मेरे हाथों से खाता था। लेकिन आज कामयाबी का ऐसा भूत चढ़ा है कि माँ के पास बैठकर खाना खाने का भी समय नहीं।”
बच्चों ने कहा, “दादी, आप ठीक हो जाओ। हम रोज़ आपके ही हाथ से खाना खाएँगे। हम हॉस्टल नहीं जाएँगे।”
दादी ने बच्चों को सीने से लगा लिया।
यह सब देखकर नर्स की आँखें भी नम हो गईं। उसने ऐसा इलाज़ कभी नहीं पढ़ा था—न किताबों में, न अस्पताल में। यह दवाई थी अपनों के साथ की, प्यार की, अपनापन की।
दादी ने मुस्कुराकर कहा,
“आज के डॉक्टर और नर्स क्या जानें कि भारत में लोग सौ साल तक निरोगी कैसे रहते थे। छोटा सा गाँव, कोई सुविधा नहीं… फिर भी हर घर में खुशहाली थी। परिवार साथ रहता था, मेहनत थी, प्यार था। वही असली दवा थी।”
अगले दिन दादी की हालत सचमुच बेहतर थी। कुछ ही दिनों में वे संभल गईं।
दवाइयाँ शरीर को ठीक करती हैं, लेकिन अपनों का प्यार आत्मा को जीवित करता है। परिवार का साथ, स्नेह और अपनापन वह अनोखी दवा है, जिसका कोई विकल्प नहीं।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
