उदय राम शहर का एक अत्यंत कुशाग्र बुद्धि वाला तर्कशास्त्री था, जिसकी पहचान एक ऐसे कट्टर नास्तिक के रूप में थी जो केवल प्रत्यक्ष प्रमाण और वैज्ञानिक आंकड़ों पर ही विश्वास करता था और अक्सर सभाओं में यह चुनौती देता था कि यदि ईश्वर है तो वह दिखाई क्यों नहीं देता, क्योंकि उसकी दृष्टि में जो अस्तित्वहीन है वही अदृश्य है। वह जीवन को रसायनों और भौतिक क्रियाओं का एक आकस्मिक मेल मात्र मानता था, जिसमें भावना या प्रार्थना का कोई स्थान नहीं था, परंतु उसके इस कठोर तार्किक संसार को एक ऐसी घटना ने झकझोर दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। एक बार अपने शोध कार्य के लिए वह हिमालय की उन दुर्गम और निर्जन पहाड़ियों के भ्रमण पर था जहाँ प्रकृति का सौंदर्य जितना मनमोहक था, उसकी कठोरता उतनी ही जानलेवा थी।
एक शाम जब वह एक संकरी ढलान से गुजर रहा था, अचानक तेज़ बारिश और भूस्खलन के कारण उसका पैर फिसला और वह हज़ारों फीट गहरी खाई की ओर लुढ़कने लगा, लेकिन किस्मत से उसकी शर्ट एक मज़बूत झाड़ी के तने में फंस गई और वह हवा में झूलने लगा। नीचे मौत का अंधेरा था और ऊपर बारिश की वजह से फिसलन भरी चट्टानें थीं जिन्हें पकड़ना नामुमकिन था; उदयराम ने कई घंटों तक मदद के लिए चीख-पुकार मचाई, लेकिन उस वीरान घाटी में उसकी आवाज़ केवल प्रतिध्वनि बनकर उसी के पास वापस आ रही थी।
जैसे-जैसे रात गहराने लगी और हाड़ कंपाने वाली ठंड ने उसके शरीर को सुन्न करना शुरू किया, उसके मस्तिष्क के सारे तार्किक समीकरण विफल होने लगे और उस क्षण में जब मौत बिल्कुल सामने खड़ी थी, उसके अहंकार की दीवार ढह गई और उसके बंद होठों से अनायास ही एक पुकार निकली, “हे ईश्वर, यदि तुम कहीं भी हो, तो आज मुझे बचा लो, मैं हार चुका हूँ।” ठीक उसी समय जब झाड़ी की जड़ें उखड़ने ही वाली थीं, ऊपर की चट्टान पर एक बूढ़ा चरवाहा हाथ में मशाल और एक लंबी रस्सी लिए प्रकट हुआ, जैसे वह पहले से ही उदयराम की प्रतीक्षा कर रहा हो। उस वृद्ध ने बड़ी कुशलता और अपनी पूरी ताकत लगाकर उदयराम को ऊपर खींच लिया और उसे अपनी कुटिया में ले जाकर आग के पास बिठाया ताकि वह ठंड से उबर सके।
जब उदयराम की चेतना वापस आई, तो उसने कांपते हुए स्वर में पूछा कि वह वृद्ध इस अंधेरी, तूफानी रात में इस खतरनाक ढलान पर क्यों आया था जबकि वहां कोई रास्ता भी नहीं था, तो वृद्ध ने बहुत सहजता से उत्तर दिया कि वह अपने घर में सो रहा था, लेकिन अचानक उसके भीतर एक ऐसी बेचैनी और व्याकुलता उठी जैसे कोई उसे पुकार रहा हो और एक अज्ञात शक्ति ने उसे मजबूर किया कि वह अपनी रस्सी उठाए और बिना कुछ सोचे इस दिशा में चल पड़े।
उदयराम यह सुनकर स्तब्ध रह गया क्योंकि गणितीय रूप से उस निर्जन पहाड़ पर, उस सटीक समय पर, एक व्यक्ति का पहुँच जाना केवल ‘संयोग’ नहीं हो सकता था; उसे पहली बार अहसास हुआ कि ब्रह्मांड में एक ऐसी सूक्ष्म और महान चेतना कार्य कर रही है जो तर्कों की सीमा से बहुत दूर है और जो हमारे मौन को भी सुनती है।
वह समझ गया कि विज्ञान भले ही यह समझा दे कि हृदय कैसे धड़कता है, लेकिन यह केवल वह सर्वोच्च सत्ता ही तय करती है कि वह धड़कन कब और क्यों सुरक्षित रहेगी।
उस रात उदयराम का नास्तिक अहंकार हिमालय की बर्फ की तरह पिघल गया और उसने स्वीकार किया कि श्रद्धा का मार्ग वहीं से शुरू होता है जहाँ तर्क की सीमा समाप्त हो जाती है, और इस प्रकार वह एक नया उदयराम बनकर लौटा जिसकी आंखों में अब केवल शून्य नहीं, बल्कि एक दिव्य विश्वास की ज्योति थी।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
