बहुत समय पहले की बात है। भारत के एक छोटे से गाँव में रामदीन नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसके पास थोड़ी-सी ज़मीन थी, जिस पर वह पूरे साल मेहनत करता। सर्दियों के दिनों में जब ठंड अपने चरम पर होती, तब उसकी फसल लगभग तैयार हो जाती। रामदीन को बस मकर संक्रांति का इंतज़ार रहता, क्योंकि इसी दिन सूर्य भगवान दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाते हैं और किसान के जीवन में आशा की नई किरण जगती है।
गाँव में मान्यता थी कि मकर संक्रांति के दिन किया गया दान और सेवा कई गुना फल देता है। रामदीन भले ही गरीब था, लेकिन उसका मन बहुत बड़ा था। उसने तय किया कि इस वर्ष वह अपनी फसल का पहला अन्न भगवान को अर्पित करेगा और ज़रूरतमंदों में बाँटेगा।
मकर संक्रांति की सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ रामदीन ने स्नान किया, सूर्य को जल अर्पित किया और तिल, गुड़ व चावल से बने पकवान तैयार किए। उसकी पत्नी ने खिचड़ी बनाई, जिसकी खुशबू पूरे आँगन में फैल गई। उसी समय गाँव के बाहर से कुछ भूखे साधु और गरीब लोग गुज़र रहे थे। रामदीन ने उन्हें आदरपूर्वक बुलाया और प्रेम से भोजन कराया।
दिन ढलने तक गाँव में पतंगें उड़ने लगीं। बच्चे खुशी से आसमान की ओर देख रहे थे। रामदीन भी अपने बेटे के साथ पतंग उड़ाने लगा। पतंग की डोर जैसे-जैसे ऊपर जाती, वैसे-वैसे उसके मन में विश्वास और उम्मीद भी ऊँची होती चली गई।
कुछ ही दिनों बाद ऐसी घटना घटी जिसने रामदीन का जीवन बदल दिया। उसकी फसल गाँव की सबसे अच्छी फसल मानी गई। व्यापारी दूर-दूर से आए और उचित मूल्य पर उसकी उपज खरीदी। पहली बार रामदीन के घर में अभाव नहीं, बल्कि संतोष और खुशहाली थी।
रामदीन समझ गया कि मकर संक्रांति नवनीत केवल एक पर्व नहीं, बल्कि त्याग, दान और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है। जिस दिन इंसान अंधकार, स्वार्थ और निराशा को छोड़कर प्रकाश, सेवा और आशा की ओर बढ़ता है—वही सच्ची मकर संक्रांति है।
मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि जब हम अपने जीवन में अच्छे कर्म, दान और परोपकार को अपनाते हैं, तो प्रकृति और ईश्वर दोनों हमारा साथ देते हैं। जैसे सूर्य उत्तरायण होकर प्रकाश बढ़ाता है, वैसे ही हमें भी अपने विचारों और कर्मों को ऊँचा उठाना चाहिए।
——– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
