” ज़िंदगी की जड़ें “

एक छोटे कस्बे में हरि प्रसाद जी नाम के बुजुर्ग रहते थे। उम्र सत्तर पार कर चुकी थी, बाल सफ़ेद, चाल धीमी, पर मन बिल्कुल निर्मल। हर शुक्रवार को वे पास के मंदिर जाकर घंटों बैठते, लोगों से कम बोलते, पर जो भी बात करते, सीधे दिल में उतर जाती।

उसी मोहल्ले में एक युवा रहता था — अमन। पढ़ा-लिखा था, पर चिड़चिड़ापन उसकी आदत बन चुका था। बात-बात पर गुस्सा, जल्दबाजी, और “मेरे पास समय नहीं” — यही उसके हर वाक्य में झलकता। घर वाले भी परेशान रहते।

एक शुक्रवार की सुबह अमन तेज़ी से कहीं जा रहा था कि रास्ते में धीरे-धीरे चलते हरि प्रसाद जी से टकरा गया। अमन बड़बड़ाया,
“इतनी धीमे चलते हो, रास्ता ही रोक देते हैं!”

हरि प्रसाद जी मुस्कुराए और बोले,
“बेटा, समय तुम्हारे पास कम नहीं, धैर्य कम है।”

अमन ने अनसुना कर दिया, पर बात दिल में चुभ गई। शाम को जब वह वापस लौटा, देखा मंदिर के बाहर वही बुजुर्ग बच्चों में फल बाँट रहे थे। वह रुक गया।

अमन बोला, “आप रोज यहाँ आते हैं? इसमें क्या मिलता है?”
हरि प्रसाद जी ने कहा,
“मैं कुछ देने नहीं आता, मैं यहाँ आकर खुद को पाता हूँ।”

अमन चकित होकर बैठ गया।

तब हरि प्रसाद जी बोले —
“बेटा, जिंदगी तीन बातों पर टिकी है —
पहला, समय की कद्र,
दूसरा, संबंधों की गर्माहट,
तीसरा, मन की शांति।

आज आदमी तेज़ दौड़ रहा है, पर उसे पता ही नहीं कि पहुँच कहाँ जाना है। शुक्रवार मेरे लिए रुकने का दिन है — अपने मन की धूल झाड़ने का दिन।”

अमन ने पूछा, “पर मैं शांति कैसे पाऊँ? सब कुछ होते हुए भी बेचैन रहता हूँ।”

हरि प्रसाद जी ने पास पड़े सूखे पत्ते को उठाया और बोले,
“यह पत्ता पेड़ से टूटकर हवा के भरोसे है — जिस तरफ़ हवा घुमाएगी, जाएगा। बेचैन मन भी ऐसा ही होता है।
लेकिन जड़ से जुड़ा पेड़ आँधी में भी खड़ा रहता है।
जब इंसान अपनी जड़ों — अपने बुजुर्गों, अपने मूल्यों, ईमान और धैर्य — से जुड़ा रहता है तो जीवन की आँधियाँ उसे गिरा नहीं पातीं।”

अमन शांत हो गया। पहली बार किसी ने उससे लड़कर नहीं, समझाकर बात की थी। उसने धीरे से पूछा,
“और यदि गलतियाँ हो चुकी हों तो?”

बुजुर्ग मुस्कुराए,
“ग़लतियाँ शुक्रवार की तरह हैं बेटा — हफ्ते का हिसाब बाँध देती हैं, पर नए सप्ताह का रास्ता भी खोलती हैं। बस सीख लो और नए सवेरे की तरह फिर से उठ खड़े हो।”

उस दिन के बाद अमन हर शुक्रवार वही बैठने लगा। गुस्सा कम होने लगा, बातों में मिठास आने लगी। और उसे समझ आ गया — जीत तेज़ दौड़ में नहीं, सही दिशा में शांत चलने में है।

 

जीवन में दौड़ना ज़रूरी है, पर बिना दिशा के नहीं। बुजुर्गों के अनुभव, धैर्य, और संबंधों का मान ही सच्ची संपत्ति है। शांति पाने के लिए रुकना, विचार करना और अपनी जड़ों से जुड़ना आवश्यक है।

——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !

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