शहर की तेज़ रोशनी और आतिशबाज़ी के शोर के बीच तन्विक अपने कमरे की खिड़की से बाहर देख रहा था। घड़ी ने बारह बजाए और लोग “हैप्पी न्यू ईयर” चिल्लाते हुए एक-दूसरे को गले लगा रहे थे। मगर तन्विक के चेहरे पर वैसी चमक नहीं थी। उसे लग रहा था कि नया साल भी पिछले साल जैसा ही होगा—अधूरे सपने और टलते हुए लक्ष्य।
तभी पीछे से उसके पिताजी आए और बोले, “नया साल कैलेंडर बदलने से नहीं, सोच बदलने से आता है।”
तन्विक मुस्कुराया, “लेकिन पापा, पिछले साल भी मैंने बहुत सारे संकल्प बनाए थे, कोई पूरा नहीं हो पाया।”
पिताजी ने शांत स्वर में कहा, “संकल्प कागज़ पर नहीं, आदत में लिखे जाते हैं।”
अगली सुबह तन्विक ने तय किया कि इस बार वह कोई लंबी सूची नहीं बनाएगा। उसने केवल तीन छोटे वादे खुद से किए—
1. रोज़ 30 मिनट पढ़ाई के अलावा कुछ नया सीखूँगा।
2. किसी की मदद करने का मौका नहीं छोड़ूँगा।
3. अपनी गलती मानने से नहीं डरूँगा।
दिन बीतते गए। उसने पुराने अलार्म की झुंझलाहट छोड़कर जल्दी उठना शुरू किया। पड़ोस के छोटे बच्चे को गणित समझाना, माँ की रसोई में मदद करना और हर सप्ताह एक नई किताब पढ़ना उसकी दिनचर्या बन गई।
मार्च का महीना आया। स्कूल में प्रतियोगिता हुई। चौंकाने वाली बात यह थी कि वही तन्विक, जो मंच से घबराता था, आत्मविश्वास के साथ भाषण दे रहा था। पुरस्कार मिला या नहीं—यह अब उसके लिए मुख्य बात नहीं थी। उसे महसूस हुआ कि वह कल से बेहतर बन चुका है।
31 दिसंबर फिर आया। वही शहर, वही रोशनी, वही आतिशबाज़ी—but इस बार तन्विक का मन शांत था। उसने कैलेंडर पलटा और डायरी में लिखा—
“नया साल आने का मतलब यह नहीं कि सब कुछ अपने आप बदल जाएगा; असली नया साल तो वह दिन है जब हम खुद को बदलना शुरू कर दें।”
पिताजी ने उसकी डायरी पढ़ी और बोले, “बधाई हो बेटा, तुम्हारा नया साल तो बहुत पहले शुरू हो चुका है।”
तन्विक मुस्कुराया। बाहर आवाज़ें गूंज रही थीं—Happy New Year!
और भीतर एक आवाज़ और स्पष्ट थी—
“नई शुरुआत आज, अभी, यहीं से।
——— राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
