नीरा हमेशा हँसती-खिलखिलाती रहने वाली महिला थी। उसका छोटा-सा परिवार—पति, माँ और आठ साल की बेटी सिया—उसी की मुस्कान से घर बन जाता था। सुबह का वक्त था। रसोई में चाय की खुशबू और गैस पर चढ़ी रोटी की महक एक साथ घुल रही थी। तभी मोबाइल की घंटी बजी—रीजते रिश्तों की आदतों की तरह, अचानक और बिना बताए।
नीरा ने सोचा—“बस दो मिनट की ही तो बात है।” एक हाथ से पलटी उठाई, दूसरे हाथ से फोन कान पर लगा लिया। दूसरी तरफ उसकी बचपन की सहेली थी। बातें पुरानी यादों की तरह बह निकलीं। चूल्हे की आँच तेज हो रही थी और रोटी धीरे-धीरे जलने लगी, मगर नीरा हँसी में डूबी रही। तभी फोन का कंपन थोड़ा तेज हुआ, मोबाइल उसके हाथ से फिसला—सीधे गैस के पास।
एक पल… और नीरा का पूरा संसार जैसे थम गया। लपटें उठीं, डर ने साँस रोक दी। नीरा का हाथ हल्का-सा जल गया। सिया दौड़कर आई—“माँ!” उसकी काँपती आवाज़ नीरा के कानों में किसी सचेत पुकार की तरह गूँज उठी। पति ने तुरंत गैस बंद की, पानी डाला और नीरा का हाथ पकड़ लिया—कंपकंपाता हुआ, मगर संभालता हुआ।
दर्द केवल हाथ का नहीं था। नीरा के भीतर अपराधबोध का एक बड़ा-सा बोझ उतर आया। उसने सिया को सीने से लगाया—“मुझे माफ कर दो… मैंने तुम्हारे सामने अपनी ही लापरवाही की मिसाल छोड़ दी।” सिया ने छोटे हाथों से उसकी आँखे पोंछ दीं। माँ बोली—“बेटी, फोन बाद में होता है, ज़िंदगी पहले।”
उस रात नीरा ने मोबाइल को रसोई से बाहर रख दिया। दीवार पर कागज़ चिपका—
“गैस पर काम करते समय फोन नहीं उठाऊँगी। ज़िंदगी का कॉल हमेशा पहले है।”
अगले दिन उसने अपनी सहेलियों को फोन किया। पहले ही वाक्य में कहा—“बोलने से पहले बस एक बात पूछ लेना, क्या मैं रसोई में तो नहीं हूँ?” हर दोस्त चुप हुई, फिर बोली—“यह तो हम सबके लिए ज़रूरी है।”
नीरा ने समझ लिया—खतरा हमेशा शोर करके नहीं आता, कभी-कभी सिर्फ एक घंटी बनकर भी आता है।
उस दिन के बाद उसके घर में एक नियम बन गया—
रसोई में केवल आग जले, फोन नहीं।
और सिया अक्सर मुस्कुराकर कहती—
“मेरी माँ ने मोबाइल नहीं, ज़िंदगी पकड़ ली।”
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज़िंदगी से बढ़कर कोई चीज़ नहीं है—न फोन, न बातचीत, न छोटी सुविधा। रसोई में गैस और आग के बीच मोबाइल का उपयोग बड़ा खतरा बन सकता है और एक क्षण की लापरवाही पूरे परिवार की खुशियों को जला सकती है। सजग रहना प्रेम का ही एक रूप है, क्योंकि अपनी सुरक्षा से हम अपने परिवार की सुरक्षा भी करते हैं। इसलिए काम करते समय पूरा ध्यान उसी पर रखें, विशेषकर रसोई में गैस जल रही हो तो फोन बाद में उठाएँ। याद रखें—कॉल वापस आ सकता है, जीवन नहीं।
——— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

