राजगढ़ कस्बे के निवासी प्राथमिक शिक्षक महेश प्रतिदिन लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित एक निर्जन क्षेत्र के विद्यालय में अध्यापन करने जाया करते थे।
विद्यालय का मार्ग सुनसान तथा विरान था, जहाँ वाहन बहुत कम ही दिखाई देते थे; अतः प्रारम्भिक दिनों में उन्हें कभी-कभी राहगीरों से लिफ्ट लेकर पहुँचना पड़ता था और जब कोई साधन उपलब्ध न होता, तब वे भगवान् प्रदत्त अपने पैरों को ही सबसे बड़ा सहारा मानकर पैदल ही निकल पड़ते।
यह सोचते हुए उनके मन में अक्सर खिन्नता भी उत्पन्न हो जाती कि इतनी उजाड़ जगह पर विद्यालय स्थापित कर सरकार ने मानो शिक्षकों और बच्चों—दोनों की परीक्षा ही ले डाली हो; फिर भी कर्तव्यनिष्ठा के कारण वे प्रतिदिन समय पर पहुँचने का प्रयास करते। कुछ समय पश्चात उन्होंने अपनी अल्प आय से धैर्यपूर्वक बचत कर एक नया स्कूटर—चेतक मॉडल—खरीद लिया।
स्कूटर प्राप्त होते ही उन्होंने एक दृढ़ संकल्प भी कर लिया कि जीवन में अब किसी भी जरूरतमंद यात्री को लिफ्ट देने से कभी इन्कार नहीं करेंगे, क्योंकि वे भली-भाँति जानते थे कि राह में बार-बार मना किए जाने पर कैसी असहायता और शर्मिंदगी अनुभव होती है।
इसी संकल्प के साथ वे प्रतिदिन अपने चमचमाते स्कूटर से विद्यालय जाते और लौटते समय किसी न किसी अजनबी अथवा परिचित को सहायता पहुँचाते रहते। एक दिन संध्या समय लौटते हुए मार्ग में उन्हें एक युवक राकेश हाथ उठाकर लिफ्ट का संकेत देता दिखाई दिया।
अपनी आदत और करुणा के अनुसार महेश जी ने स्कूटर रोककर उसे बैठा लिया। कुछ दूर पहुँचते ही उस युवक ने अचानक चाकू निकालकर उनकी पीठ से सटा दिया और कठोर स्वर में बोला—“जितने रुपए पास हैं सब दे दो और यह स्कूटर भी मेरे हवाले करो।” महेश जी क्षणभर को स्तब्ध रह गए। फिर भी धैर्य न खोते हुए उन्होंने स्कूटर रोक दिया।
उनके पास अधिक धन तो था नहीं, परंतु परिश्रम और पाई-पाई जोड़कर खरीदा गया स्कूटर उन्हें अत्यंत प्रिय था। फिर भी उन्होंने शांत भाव से स्कूटर की चाभी सौंपते हुए केवल इतना निवेदन किया—“एक बात का वचन देना कि तुम यह कहीं न कहना कि यह स्कूटर तुमने किसी शिक्षक को धमकाकर छीना है।
मैं भी इसकी चोरी की रिपोर्ट नहीं लिखवाऊँगा, क्योंकि यदि यह बात फैल गई तो इस सुनसान मार्ग पर आगे से कोई भी जरूरतमंद को लिफ्ट नहीं देगा और अनेक लोग सहायता से वंचित रह जाएँगे।” यह सुनकर राकेश क्षणभर के लिए निरुत्तर हो गया; उसे लगा कि सामने खड़ा व्यक्ति केवल अपनी हानि की चिंता नहीं करता, बल्कि समाज के व्यापक हित के बारे में सोच रहा है। फिर भी पेट की मजबूरी और लालच ने उसे अपने मार्ग से न हटने दिया और वह “ठीक है” कहकर स्कूटर लेकर चला गया। अगले दिन प्रातः जब महेश जी अख़बार लेने के लिए घर का दरवाज़ा खोलने पहुँचे तो आश्चर्यचकित रह गए—उनका वही स्कूटर दरवाज़े पर खड़ा था, टंकी भरी हुई थी और उससे एक कागज़ चिपका हुआ था। उसमें राकेश ने लिखा था—“मास्टर साहब! यह मत समझिए कि आपकी बातों से मेरा हृदय पिघल गया।
कल मैं स्कूटर बेचने निकला तो भंगार वाले ने तुरंत पहचान लिया कि यह आपका ही स्कूटर है। वहाँ से मुश्किल से निकला तो हलवाई की दुकान पर सबने इसे ‘मास्टर साहब का स्कूटर’ कहकर पहचान लिया।
आगे शहर के नाके पर पुलिसकर्मी ने भी यही प्रश्न किया कि यह स्कूटर आपके पास कैसे आया। ऐसा लगा मानो पूरा कस्बा आपको और आपके स्कूटर को पहचानता है। आपके प्रति लोगों के सम्मान और आपकी भलाई की चर्चा हर जगह सुनकर मेरे भीतर अपराधबोध जाग उठा।
अब इसे बेचने का न तो साहस बचा है और न ही इच्छा।
आपकी असुविधा की भरपाई करने के लिए इसका टैंक भरवा दिया है।” यह पढ़कर महेश जी के चेहरे पर सहज मुस्कान खिल उठी और उन्होंने मन-ही-मन कहा—“कर भला तो हो भला।” इस घटना से स्पष्ट शिक्षा मिलती है कि सच्ची भलाई निरर्थक नहीं जाती; सद्व्यवहार, करुणा और निःस्वार्थ सेवा व्यक्ति के भीतर सुप्त सद्गुणों को जागृत कर देती है। दया और ईमानदारी का बीज भले ही तुरंत न फले, पर किसी न किसी रूप में फल अवश्य देता है।
अतः मनुष्य को परिस्थिति कैसी भी हो, सदैव नेक आचरण और उदार वृत्ति का मार्ग ही अपनाना चाहिए।
———- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
