” बचपन “

उम्र का वह मुकाम बहुत पीछे छूट चुका था, जहाँ ज़िंदगी हल्की हुआ करती थी। जहाँ सुबह आँख खुलते ही यह चिंता नहीं होती थी कि आज क्या कमाना है, बल्कि यह सोच होती थी कि आज कौन-सा खेल खेलेंगे। तब जेब खाली होने का मतलब दुख नहीं होता था, क्योंकि सपने भरे रहते थे। धूप बदन को नहीं, केवल मैदान को छूती थी और थकान शब्द का अर्थ केवल इतना था कि माँ आवाज़ लगाकर घर बुला ले।

अब सब कुछ बदल चुका था। कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ था और आँखों में नींद कम, सोच ज़्यादा रहती थी। रुपये-पैसे का हिसाब इतना पक्का हो गया था कि दिल के हिसाब अक्सर ग़लत साबित होने लगे थे। लोग कहते थे—“अब तुम समझदार हो गये हो।” सच यही था कि समझदारी के नाम पर हमने बहुत कुछ खो दिया था। हँसना सीमित हो गया, बोलना नपा-तुला और चुप्पी स्थायी साथी बन गई।

रवि भी उन्हीं लोगों में से एक था। सुबह ऑफिस, शाम घर, और रात मोबाइल की नीली रोशनी में खोई हुई आँखें—यही उसकी दिनचर्या थी। एक दिन अचानक बिजली चली गई। मोबाइल बंद हो गया और कमरे में अँधेरा छा गया। खिड़की से आती ठंडी हवा में उसे बाहर से बच्चों के खेलने की आवाज़ सुनाई दी—हँसी, शोर, और बेपरवाही से भरी हुई। न जाने क्यों उसका दिल भर आया।

वह बाहर निकला। गली में बच्चे कंचे खेल रहे थे। एक कंचा उसके पैरों के पास आकर रुका। उसने उठाकर बच्चे को दे दिया। बच्चे ने मुस्कराकर कहा, “अंकल, आप भी खेलोगे?” रवि एक पल ठिठका। सालों बाद किसी ने उसे बिना किसी मतलब, बिना किसी पहचान के बुलाया था। उसने जूते उतारे और ज़मीन पर बैठ गया।

उस पल समय जैसे रुक गया। न ऑफिस की फाइलें याद थीं, न बैंक बैलेंस। सिर्फ मिट्टी की खुशबू थी, बच्चों की हँसी थी और उसका अपना खोया हुआ बचपन था। खेल खत्म हुआ तो पसीना बह रहा था, लेकिन मन हल्का था। उसे एहसास हुआ कि बड़ा होना बुरा नहीं, बुरा यह है कि हम अपने भीतर के बच्चे को मरने देते हैं।

रवि ने उस दिन तय किया कि वह हर रोज़ थोड़ा-सा बचपन ज़रूर जिएगा। कभी बिना वजह हँसेगा, कभी बारिश में भीगेगा, और कभी ज़िंदगी को ज़्यादा समझने की कोशिश नहीं करेगा।

क्योंकि ज़िंदगी को सुलझाने से ज़्यादा ज़रूरी है, उसे महसूस करना। और शायद सच यही है—हम बड़े हो गये हैं, यह बुरा नहीं है। बुरा तब होता है, जब हम परिपक्वता के नाम पर बेफिक्री खो देते हैं। कभी-कभी दौड़ जाना चाहिए, इतनी तेज़ कि बस एक बार फिर… बचपन जी लिया जाए।

——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !