जूनागढ़ की सुबहें बड़ी सादी होती थीं—
धूल भरी गलियाँ, नीला आसमान, और मंदिरों से उठती घंटियों की लहर…
पर उसी साधारण दुनिया में एक असाधारण लड़का जन्मा था—
नरसी।
लोगों की नजर में वो भोला था !
पर भीतर🔥 एक ऐसी अग्नि, जो केवल कृष्ण का नाम सुनते ही भड़क उठती थी।
नरसी का मन न खेतों में लगता, न व्यापार में।
वह घंटों बैठकर गाता—
“कृष्ण… कृष्ण…”
जैसे दुनिया नहीं, बस एक ही नाम उसका जीवन हो।
घरवाले परेशान—
“लड़का हाथ से निकल जाएगा!”
पर नरसी मुस्कुराता, मानो कह रहा हो—
“मैं तो पहले ही निकल चुका हूँ… कृष्ण के रास्ते पर।”
एक दिन दहलीज़ पर खड़ी भौजाई बोली—
“तू भगवान—भगवान करता रहता है…
इतनी भक्ति है तो उन्हें सामने बुला क्यों नहीं लेता?”
बस…
वो ताना किसी तीर की तरह हृदय में उतर गया।
और इसी एक वाक्य ने नरसी का रास्ता मोड़ दिया।
रात के सन्नाटे में, नरसी अकेले निकल पड़े—
जूनागढ़ से बाहर, एक पुराने शिवालय के पास।
पीपल की छाया में बैठकर आँखें बंद कर लीं।
फिर मंत्र…
फिर जप…
फिर ध्यान…
इतना गहरा कि हवा भी स्थिर हो गई।
और तभी—⚡ प्रकाश की लहरें… हवा में सुगंध… और सामने प्रकट हुए स्वयं भगवान शिव।
नरसी की आँखें नम हो गईं—
“प्रभू… एक ही निवेदन है…
मुझे मेरे कृष्ण के दर्शन करा दो।”
शिव मुस्कुराए।
क्षणभर में दुनिया गायब…
और नरसी ने खुद को पाया—
गोलोक में।
जहाँ तक नज़र जाए—
कानों में बाँसुरी की मधुर धुन,
चारों तरफ़ प्रकाश, और बीच में—
श्रीकृष्ण।
नरसी का रोम-रोम बोल उठा—
“ये… ये तो वही हैं…”
कान्हा की मुस्कान…
उनकी चाल…
उनकी आँखों का मृदु कमाल…
सब कुछ इतना सजीव कि समय रुक गया।
रास में खोए हुए नरसी ने मशाल उठाई—
हाथ जल गया।
पर कृष्ण ने बस उंगलियों से छू दिया
और घाव ऐसे मिटा, जैसे कभी हुआ ही न हो।
नरसी समझ गए—
भक्ति कष्ट नहीं देती… भक्ति पास बुलाती है।
घर लौटते ही समाज ने बोला—
“पिता का श्राद्ध कराओ। भंडारा दो।”
पर घर खाली… रसोई खाली… जेब खाली।
सिर्फ एक चीज़ भरी थी—
❤️ विश्वास।
और उसी विश्वास ने चमत्कार कर दिया—
रसोई में इतनी रौनक…
मानो कोई अदृश्य रसोइया काम कर रहा हो।
बस घी की कमी रह गई।
नरसी बाज़ार निकले—
पर रास्ते में कीर्तन शुरू हो गया।
घी भूल गए… खुद को भूल गए…
बस कृष्ण का नाम गूंजता रहा।
रात होते-होते घर पर चिंता बढ़ गई।
और तभी…
खट… खट… खट…
दरवाज़ा खुला।
एक साधारण-सा आदमी घी का घड़ा रखकर चला गया।
वह नरसी नहीं थे।
वह कृष्ण थे।
पत्नी ने कहा—
“घी तो आपने भेज दिया था… भंडारा पूरा हो गया।”
नरसी की आँखें भर आईं—
उन्होंने पूरी सच्चाई बताई।
पत्नी की आँखें भीग गईं—
“आज… प्रभु हमारे घर आए?”
दोनों की आँखों में भक्ति की दीपक जल उठे।
कई लोग नरसी की भक्ति से जलते थे।
उन्होंने यात्रियों को उकसाया—
“द्वारका जाकर एक सेठ सांवल शाह से हुंडी लिखवा लाना।”
नरसी ने उसी नाम से कागज लिख दिया।
पर द्वारका में कोई सांवल शाह था ही नहीं।
लोग बोले—
“अब पैसा तो नरसी देगा!”
नरसी फिर भी शांत—
घर में भंडारा करवाया—
और अंत में बचीं सिर्फ चार रोटियाँ।
तभी आए एक वृद्ध साधु।
पत्नी ने वह बची हुई रोटियाँ भी श्रद्धा से परोस दीं।
उधर द्वारका में—
अचानक एक तेजस्वी सेठ प्रकट हुआ—
हुंडी चुकाकर, धन सहित।
लोग दंग।
नरसी मुस्कुराए—
“कान्हा फिर आ गए… इस बार सेठ बनकर।”
यह वह घटना है जिसे सुनते ही रूह कांप उठती है।
नानी बाई… नरसी की बेटी…
ससुराल वालों ने मायरे में इतनी भारी माँग लिखकर भेजी
कि सात जन्मों की संपत्ति भी काम न आए।
नरसी टूट गए—
पर भक्ति नहीं टूटी।
रात में क्रंदन… निराशा…
और तभी कान्हा की आवाज—
“नरसी… चिंता मत करो।
मैं कल आऊँगा।”
अगले दिन सूरज भी शायद ठहरकर देखने लगा—
जूनागढ़ की गलियों में धूल नहीं—
सोना चमक रहा था।
सैकड़ों ऊँट…
घोड़ों की पंक्तियाँ…
भरपूर सामान से लदी गाड़ियाँ…
और सबसे आगे—
एक भव्य सेठ।
ससुराल वालों ने पूछा—
“कौन हैं आप?”
वह बोले—
“नरसी का सेवक।”
और वह सेठ?
कौन था?
✨ कृष्ण स्वयं।
नरसी की कहानी कभी खत्म नहीं होती।
क्योंकि भक्ति खत्म नहीं होती।
जब-जब कोई “कृष्ण” नाम लेता है
कहीं-न-कहीं नरसी का सुर गूंज उठता है।
दुनिया कह सकती है—
“भक्ति से क्या मिलता है?”
पर नरसी की कथा जवाब देती है—
“प्रेम सच्चा हो तो भगवान भी दरवाज़े पर दस्तक देते हैं।”
और नरसी ने यही सिखाया—
“समर्पण करो…
🙏🚩बाकी सब कृष्ण सम्भाल लेंगे।”
——- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
