आज क्यूं रूठ गए हमको मनाने वाले
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मुड़के क्यूं देखते है हमको ज़माने वाले
तू ही बतला दे मुँह फेर के जाने वाले
ऐसा क्या ज़ुर्म किया तुमसे दोस्ती करके ,
छोड़कर चल दिए क्यूं साथ निभाने वाले
जाने किस बात की नाराज़गी दिल में लेकर
आज़ ख़ुद रूठ गए हमको मनाने वाले
दिल में इक जान बसा करती है जिनकी खातिर ,
क्यूं ये दिल तोड़ दिया दिल में बसाने वाले
ग़ैर कहकर कर तो रुसवा न किया होता हमें
तुम ही अपने थे फ़क़त अपना बनाने वाले
मुझको अफ़सोस है ऐ मुझको सताने वाले ,
चले गए तो कहाँ खोजेंगे सताने वाले !
——- राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !
