एक छोटे से कस्बे में एक बुज़ुर्ग बढ़ई रहता था। उसका काम तो अच्छा था, पर उम्र के चलते उसकी चाल और गति थोड़ी धीमी हो गई थी।
एक दिन उसके पास एक आदमी आया और बोला—
“काका, मेरे घर के पीछे वाली लकड़ी की बाड़ को ठीक कर दो। कुछ तख्ते ढीले हो गए हैं।”
बढ़ई अपने औज़ार लेकर गया, और जैसे ही उसने बाड़ की मरम्मत शुरू की, उसे बाड़ के नीचे एक छोटा-सा टूटा हुआ लकड़ी का हिस्सा मिला, जिसमें एक पतली दरार थी।
किसी के कहे बिना ही उसने सोचा—
‘अगर ये टूटा हिस्सा ज्यों का त्यों रहा, तो कभी भी गिरकर किसी को चोट पहुँचा सकता है।’
उसने अतिरिक्त समय लगाकर बाड़ के उस कमजोर हिस्से को भी पूरी तरह नया कर दिया।
काम पूरा किया, पैसे लिए और घर चला आया।
अगले दिन सुबह-सुबह उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई।
वही आदमी खड़ा था—हाथ में एक बड़ा-सा थैला और आँखों में कृतज्ञता।
उसने कहा—
“काका, ये आपकी मेहनत और समझ के लिए नहीं… ये आपकी भलाई के लिए है।”
बढ़ई हैरान हो गया—
“मैंने तो वही किया जो आपने कहा था—ढीले तख्ते ठीक कर दिए।”
आदमी ने गहरा साँस लेते हुए कहा—
“नहीं काका… आपने सिर्फ तख्ते नहीं, बल्कि कल मेरी बेटी की जान बचाई है।
कल शाम वह बाड़ के पास खेल रही थी। अगर वह टूटा हुआ हिस्सा आपने न बदला होता, तो पूरे का पूरा ढांचा गिर सकता था।
आपने बिना बताए वह काम करके ऐसा उपकार कर दिया, जिसे मैं ज़िंदगी भर चुका नहीं सकता।
ये आपके हाथों की कीमत नहीं…
ये उस अनमोल सुरक्षा की कीमत है जो आपने मेरी बच्ची को दी है।”
बढ़ई की आँखें भर आईं।
उसे समझ आया कि कभी-कभी सबसे बड़ा काम वही होता है, जो हम बिना सोचे-समझे, बस मानवता के नाते कर देते हैं।
*कहानी से सीख*
जीवन में भलाई कभी छोटी नहीं होती।
आपका एक छोटा-सा मदद का काम भी किसी की दुनिया बचा सकता है।
हमेशा इतना ही कीजिए, जितना आपकी आत्मा सही समझे;
क्योंकि न जाने कब कौन-सा छोटा सा कार्य—
किसी के लिए वरदान बन जाए !
——– राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
