पति मुस्कुराता हुआ अपने मोबाइल पर उँगलियाँ दौड़ा रहा था, जैसे उसी स्क्रीन में उसकी पूरी दुनिया बसती हो।
पत्नी बड़ी देर से उसके पास बैठी थी—खामोशी से, आदत-सी बन गई थी यह। जब भी वह अपने पति नवनीत से कुछ कहती, तो जवाब बस ‘हाँ’, ‘हूँ’ या दो-चार नपे-तुले शब्दों में मिलता।
आज हिम्मत करके उसने पूछ लिया—“किससे चैटिंग कर रहे हो?”
पति ने बिना आँख उठाए कहा—“फेसबुक फ्रेंड से।” पत्नी ने फिर पूछा—“कभी मिले हो उनसे?” “नहीं।” “फिर भी इतने मुस्कुराते हुए?”
पति हँस दिया—“और क्या करूँ, बातें मज़ेदार होती हैं।” पत्नी कुछ देर तक उसे देखती रही, फिर बोली—“फेसबुक पर आपकी महिला मित्र भी तो होंगी?”
नवनीत ने मुस्कुराते हुए ‘हूँ’ कहा और उँगलियों का खेल फिर शुरू हो गया। पत्नी के मन में अनकहे प्रश्नों का तूफान था, वह बोली—“उनसे भी यूँ ही मुस्कुराकर बातें करते हो?
क्या आप सबको भली-भाँति जानते भी हो?”
नवनीत बोला—“जानते तो नहीं, पर रोज बातों-बातों में अपनापन-सा महसूस होता है, हँसी अपने आप आ जाती है।”
पत्नी मंद स्वर में बुदबुदाई—“और पास बैठी पत्नी पराई लगने लगी है…” नवनीत को उसकी बात सुनाई ही नहीं दी।
वह बोला—“अभी मज़ेदार टॉपिक चल रहा है, तुम क्या कह रही थीं? दोबारा बोलो।”
वह पत्नी को देख रहा था, पर वास्तव में देख नहीं रहा था। पत्नी गहरी नज़र से उसे देखती रही और धीरे से बोली—“सुनो, मेरी एक इच्छा पूरी करोगे?” नवनीत ने मोबाइल रोकते हुए कहा—“अब तक कौन-सी इच्छा अधूरी छोड़ी है?
बोलो, क्या चाहिए?” पत्नी ने भीगी आँखों से कहा—“एंड्रॉयड मोबाइल चाहिए।” नवनीत चौंक गया—“बस! इतनी सी बात? ले दूँगा। पर क्यों चाहिए?” पत्नी ने कांपती आवाज़ में उत्तर दिया—“ताकि चैटिंग के ज़रिए… तुम मुझसे भी खुलकर बातें कर सको…” नवनीत कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गया। मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिपा उसका हँसता चेहरा पहली बार धीमा हुआ। उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिसके साथ वह जीवन बिता रहा है, वही उसके ध्यान के लिए तरस गई थी। जिसे वह सबसे करीब समझता था वो सबसे दूर जा खड़ा हुआ था—सिर्फ कुछ डिजिटल लोगों के कारण, जिनसे न कोई रिश्ता था, न कोई भविष्य। आज उसकी पत्नी ने कुछ नहीं कहा, पर जो कहा वह उसकी चुप्पी से कहीं ज़्यादा गहरा था।
वह समझ गया था कि डिजिटल दुनिया में डूबकर वह अपनी वास्तविक दुनिया भूल गया था—वह दुनिया जिसमें उसकी पत्नी थी, उसका परिवार था, उसका अपना जीवन था। आज का दौर डिजिटल है, सुविधाजनक है, लेकिन इसी सुविधा ने इंसान को इतना व्यस्त कर दिया है कि वह अपनी निजी ज़िंदगी को समय ही नहीं दे पाता। मोबाइल बातें करा सकता है, पर मन नहीं समझ सकता; चैटिंग मुस्कुराहट दे सकती है, पर अपनापन नहीं। पत्नी की आँखें कह रही थीं—बहुत-सी महिलाएँ इसलिए अकेली महसूस करती हैं क्योंकि उनके पति के पास उनके लिए समय नहीं होता; न उन्हें सुनने का, न समझने का।
ऐसे में मन एक साथी ढूँढता है—कोई जो उनकी बातें सुने, उनकी भावनाओं को समझे, उनके अकेलेपन को महसूस कर सके। यह गलत नहीं, यह एक इंसानी ज़रूरत है—अपनापन पाने की, सुने जाने की, महसूस किए जाने की।
गलती तब है जब पति अपनी पत्नी को इस कदर अकेला कर दे कि वह अपने ही घर में पराई बन जाए। हर औरत का अधिकार है कि वह खुलकर जी सके, महसूस कर सके कि वह महत्वपूर्ण है, उसे भी प्यार और ध्यान मिलता है। नवनीत ने धीरे से अपना मोबाइल नीचे रखा और पहली बार अपनी पत्नी का हाथ पकड़कर बोला—“माफ़ करना… शायद मैं तुमसे दूर होता जा रहा था… पर अब नहीं।” पत्नी की आँखों में चमक थी—क्योंकि वह सिर्फ मोबाइल नहीं, बल्कि अपना पति वापस पा रही थी।
कहानी हमें यही सिखाती है कि डिजिटल दुनिया चाहे जितनी बड़ी हो जाए, पर असली रिश्ते स्क्रीन पर नहीं, दिलों में बसते हैं। इसलिए पहले अपने घरवालों को, अपने रिश्तों को समय दो—क्योंकि मोबाइल महत्वपूर्ण हो सकता है, पर परिवार उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
——- राम कुमार दीक्षित, पत्रकार !
