एक छोटे से गांव में एक अत्यंत समझदार, शांत और संस्कारी महिला रहती थी। गांव के लोग उसकी विनम्रता और धैर्य की मिसाल दिया करते थे। उसके चेहरे पर हमेशा एक सुकून भरी मुस्कान रहती थी। उसका एक बेटा था, जो अपनी मां से बहुत प्रेम करता था और हर बात को बड़े ध्यान से समझने की कोशिश करता था।
एक दिन सुबह-सुबह मां और बेटा किसी काम से गांव के दूसरे छोर की ओर जा रहे थे। मौसम बड़ा सुहावना था। पक्षियों की मधुर आवाजें वातावरण को और भी सुंदर बना रही थीं। दोनों धीरे-धीरे बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे कि तभी रास्ते में एक पागल औरत आ गई।
उस औरत का स्वभाव बहुत उग्र था। वह अचानक उस महिला पर चिल्लाने लगी। बिना किसी कारण के वह उसे अपशब्द कहने लगी। उसने महिला के चरित्र, उसके परिवार और यहां तक कि उसके पति के लिए भी बहुत बुरी बातें कही। आसपास खड़े कुछ लोग यह दृश्य देखकर हैरान थे।
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि उस महिला के चेहरे पर जरा भी क्रोध नहीं आया। वह शांत भाव से मुस्कुराती रही और बिना कुछ कहे आगे बढ़ती रही।
पागल औरत को लगा कि शायद उसकी बातें कम असर कर रही हैं, इसलिए वह और भी ज्यादा गुस्से में आ गई। अब वह और कटु शब्द बोलने लगी। मगर फिर भी महिला ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
आखिरकार जब वह औरत लगातार चिल्लाते-चिल्लाते थक गई और सामने से कोई जवाब नहीं मिला, तो वह बड़बड़ाती हुई वहां से चली गई।
बेटा यह सब देखकर भीतर ही भीतर परेशान था। कुछ दूर जाने के बाद उसने अपनी मां से पूछा—
“मां, उस औरत ने आपको इतना अपमानित किया, पिताजी और पूरे परिवार तक को बुरा-भला कहा, फिर भी आपने उसे कुछ जवाब क्यों नहीं दिया? क्या आपको बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा?”
मां मुस्कुराई, लेकिन उस समय उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह बेटे को लेकर सीधे घर पहुंची।
घर पहुंचने के बाद मां अंदर कमरे में गई और थोड़ी देर बाद कुछ बहुत मैले और बदबूदार कपड़े लेकर बाहर आई। उसने वे कपड़े बेटे की ओर बढ़ाते हुए कहा—
“लो बेटा, अपने साफ कपड़े उतारो और ये कपड़े पहन लो।”
बेटे ने जैसे ही उन कपड़ों को हाथ लगाया, उसने तुरंत उन्हें दूर फेंक दिया और बोला—
“मां! ये कपड़े कितने गंदे हैं। इनमें से तो बहुत बदबू आ रही है। मैं इन्हें कैसे पहन सकता हूं?”
तब मां ने बड़े प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा, जैसे तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े पहनना पसंद नहीं कर सकते, वैसे ही मैं भी किसी के गंदे शब्द अपने साफ मन में धारण नहीं कर सकती। यदि मैं भी उस औरत की बातों का जवाब गुस्से से देती, तो मेरा मन भी मैला हो जाता।”
मां की बात सुनकर बेटे की आंखें खुल गईं। उसे समझ आ गया कि सच्चे संस्कार वही हैं, जो परिस्थिति कैसी भी हो, मन की शांति को टूटने न दें।
दूसरों के कटु शब्द तभी तक हमें दुख देते हैं, जब तक हम उन्हें अपने मन में जगह देते हैं।
जिसका मन शांत और स्वच्छ होता है, वही जीवन में सच्चा सुख पाता है।
* राम कुमार दीक्षित, पत्रकार
