“न सोच रखते थे, न समझ रखते थे l
जब हम बच्चे थे, बस सच रखते थे !!
पल में रूठ जाना, पल में मुस्कुराना,
व्यवहार में इसकदर लचक रखते थे !!
अपने मुट्ठी जितने से दिल के भीतर,
प्यार दया करुणा खचाखच रखते थे !!
आज ये सिक्के नहीं चलते, फिर भी,
मिट्टी की डुबलियों में बचत रखते थे !!
*केवल एक ही गुनाह हुआ बचपन में,*
*जल्दी बडे़ होने की हसरत रखते थे !!*
——— राम कुमार दीक्षित , पत्रकार !

